सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
इस चक्र में मित्र और उच्च स्थान के सम्बन्ध में ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन दोनों स्थानों में से किसी स्थान में रवि या चंद्र १ ही बार आ जावे तो मित्र होते हैं, परन्तु दूसरे ग्रह इन स्थानों में २ बार आवे तब मित्र होते हैं, १ बार आने से सम होते हैं, शेष शत्रु होते हैं। जैसे मंगल का विचारना है, गुरु २ स्थान (१२-६) में आया है तो मित्र हुआ, परन्तु रवि, चंद्र १ ही बार, ५ रवि, ४ चंद्र आने से मित्र हुआ। शुक्र १ बार आया है, इसी प्रकार शनि उच्च में १ ही बार आया है तो शत्रु। शं. सम हुए। शेष बुध वषा वह शत्रु हुआ। इसी प्रकार सबकी मैत्री विचारना।
तात्कालिक मैत्री Temporal friendship
जिस प्रकार कोई किसी का मित्र होने पर भी तात्कालिक परिस्थिति के कारण विरोध या समता का भाव दिखाता है या शत्रु रहने पर भी तात्कालिक अवस्था के अनुसार कभी मित्रता कभी समता दर्शाता है, इसी प्रकार ग्रहों की नैसर्गिक मैत्री रहने पर भी परिस्थिति के अनुसार मैत्री में परिवर्तन हो जाता है। इसको तात्कालिक मैत्री कहते हैं, अर्थात् तात्कालिक अवस्था के अनुसार जो मैत्री होती है उसे तात्कालिक मैत्री कहते हैं। मित्र=२, ३, ४ और १२, ११, १० वें स्थान के ग्रह शत्रु=१, ५, ६, ७, ८, और ९ वें स्थान के ग्रह जन्म कुंडली या किसी कुंडली में कोई ग्रह जहाँ पर भी हो उस स्थान को छोड़
कर आगे के ३ स्थान और पीछे के ३ स्थानों में रहने वाले ग्रह उस ग्रह के तात्कालिक मित्र हो जाते हैं। शेष स्थान में रहने वाले ग्रह उसके शत्रु हो जाते हैं।
अर्थात् किसी विशेष स्थान से दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान में और दशम, ग्यारहवें और बारहवें स्थान में रहने वाले ग्रह मित्र हो जाते हैं, शेष स्थान के ग्रह शत्रु होते हैं। जैसे यहाँ पर शनि सप्तम स्थान में है, उससे कौन-कौन स्थान के ग्रह मित्र शत्रु होंगे अगर कुण्डली में बताया है।
यहाँ इसको और भी उदाहरण देकर तात्कालिक मैत्री समझाते हैं।