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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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ग्रहों की दृष्टि : १५१

इन ग्रहों का योग अच्छा है—

(१) गुरु का—नेप. हर्षल. श. सृ. बु. या चं. के साथ अच्छा है।

(२) शुक्र का—बुध या चंद्र से योग अच्छा है।

(३) वृष—चंद्र का भी योग अच्छा है।

(४) शेष ग्रहों का योग कम या अधिक, स्थिति के अनुसार हानि कारक है।

युति योग—रवि-गुरु, गुरु-चंद्र, चंद्र-बुध, चंद्र-शुक्र, रवि-शुक्र इनकी युति अच्छी मानी जाती है।

जब २ या अधिक ग्रह एक राशि में जितने पास-पास हों उतना ही अधिक युति का प्रभाव होता है। जैसे वृष के ४° पर गुरु है और मेष के २६° पर सूर्य है। यहाँ सूर्य गुरु के पास जा रहा है उस समय वह संयोगी applying or approaching कहलायेगा। जब सूर्य गुरु के पास मिलकर उसके आगे बढ़ेगा अर्थात् गुरु के अंश से सूर्य के अंश अधिक बढ़ने लगे तब सूर्यवियोगी Separating ग्रह कहलायेगा। जब ग्रह वियोगी होता है तो वह संयोगी अवस्था से अधिक शक्तिशाली होता है। मान लो गुरु वृष के ४ अंश पर है और सूर्य वृष से १२° पर है तो गुरु और सूर्य का युत योग का अधिक प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि वह वियोगी (उससे दूर हटने की) अवस्था है।

क्रांतिसाम्य दृष्टियोग

जब दोनों ग्रहों की स्पष्ट क्रांति (चाहे दोनों की क्रांति एक दिशा में या भिन्न दिशा में हो) अंशादि में समान आ जावे, उस समय क्रांति साम्य दृष्टियोग होता है। इसका परिणाम युति के परिणाम से भी अधिक महत्व का समझा जाता है।

प्रति योग—जयुष ग्रह की अयुष दृष्टि हो तो विशेष अयुष दायक होती है। ग्रहों का योग इस प्रकार विचार किया जाता है :—

(१) चंद्र का—सब ग्रहों के साथ, क्योंकि यह शक्तिशाली है।

(२) वृष का—शु. सृ. मं. गु. श. हर्षल और नेपच्यून के साथ।

(३) शुक्र का—सृ. मं. गु. श. ह. और ने. के साथ

(४) सूर्य का—मं. गु. श. ह. और ने. "

(५) मंगल का—गु. श. ह. और ने. "

(६) गुरु का—श. ह. और ने. "

(७) शनि का—ह. और ने. "

(८) हर्षल का—ने. "

(९) नेपच्यून का किसी भी ग्रह के साथ योग नहीं होता क्योंकि वह सबसे कम चलने वाला है।