सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंज्योतिष शास्त्र में विश्वास : ५
सम्बन्ध की बातें भी प्रमाणित की जाती हैं कि कहाँ तक भविष्य कथन सत्य निकला जिन पर विचार करने से भविष्य कथन की सत्यता पर लोगों का विश्वास होने लगा है।
प्रायः यह भी देखा जाता है कि कई लोगों की भविष्यवाणी असत्य भी निकल जाती है। इसका मुख्य कारण कल्पना शक्ति है। क्योंकि यह तो कल्पना और तर्क शास्त्र है, जिसमें कल्पना और तर्क करने के सिद्धान्त दिये हैं, उनमें वे प्रभाव घटित होने का संकेत मिलता है। यदि कल्पना में भूल हुई तो भविष्य कथन में अवश्य अन्तर पड़ेगा। डाक्टर जो कई वर्षों तक अंग्रेजी पढ़ कर डाक्टरी विद्या अध्ययन कर पद प्राप्त करता है, जब डाक्टर होकर किसी रोग का निदान करता है तो उस रोग के विषय में भिन्न-भिन्न डाक्टरों की भिन्न-भिन्न राय हो जाती है। जब असली रोग की जड़ पा जाते हैं तो निदान पक्का हो जाता है।
इस विषय में श्री स्टेनली लीफ इंग्लैण्ड के प्रमुख प्राकृतिक चिकित्सक एवं “हैलथ फार आल” मासिक पत्रिका के सम्पादक ने लिखा है। सर डेविड ब्रुमंड ने ग्लासगो की रायल फेकल्टी आफ सर्जरी के सभापति की हैसियत से अपने भाषण में कहा था कि ‘शव परीक्षा से यह बात अलीसांति प्रमाणित हो चुकी है कि औसत दर्जे के चिकित्सकों का निदान ८० प्रतिशत गलत हुआ करता है’।
बोस्टन के सुप्रसिद्ध चिकित्सक और निदान शास्त्री डाक्टर रिचर्ड केवट ने, जिन्होंने निदान पर एक शास्त्रीय पुस्तक लिखी और हार्वर्ड विश्वविद्यालय में सम्मानित अध्यापक है, अमेरिकन मेडिकल असोसियेशन के वार्षिक अधिवेशन में अपने विस्तृत अनुभव के आधार पर लिखित एक निबन्ध प्रस्तुत किया था। जिसमें उन्होंने एक हजार रोगियों का विवरण देकर विश्लेषण कर यह परिणाम निकाला था कि सब मिलाकर ५० प्रतिशत निदान सही और ५० प्रतिशत बिल्कुल गलत थे।
हृदय रोग के प्रसिद्ध चिकित्सक सर जेम्स मैकेंजी ने अपनी मृत्यु के कुछ समय पूर्व एक भाषण में यह धारणा व्यक्त की थी कि जीवन पर्यन्त अनुसंधान और शव-परीक्षण करने के उपरान्त मैं इस परिणाम पर पहुँचा हूँ कि चिकित्सक लोग साधारण रोगों में ७० प्रतिशत गलत निदान करते हैं। असाधारण रोगों में यह संख्या और अधिक होगी। जब उन्नति के शिक्षर पर पहुँची डाक्टरी विद्या का यह हाल है तो फिर ज्योतिष शास्त्र को क्यों बदनाम किया जाता है ?
इसी प्रकार बड़े-बड़े जज जो अनेक वर्षों तक विद्या अध्ययन कर कानूनों पुस्तकों का पूरा ज्ञान प्राप्त कर चुकते हैं किसी अभियोग का निर्णय कर अपराधी को प्राण दण्ड की सजा देते हैं। परन्तु अपील करने पर ऊँची अदालत उस जज के निर्णय को पलट कर अपराधी को उन्हीं साक्षियों के आधार पर निर्दोष पाकर छोड़ देती है। इसी को कहते हैं विचार शक्तियों में अन्तर। विचार करने में असावधानी या कोई विशेष बात की सूझ का अभाव या समझ की भूल वहाँ पर होने के कारण फल कथन में अन्तर पड़ सकता है।