सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्राच्यकथन
वैदिक काल से भारतीय विज्ञानों में ज्योतिष शास्त्र का एक प्रमुख स्थान रहा है। विना दूरबीन के गणित और फलित ज्योतिष दोनों ही में, प्राचीन काल में जितना विशद विवेचन ज्योतिष के सम्बन्ध में भारतवर्ष में हुआ है, शायद ही किसी अन्य राष्ट्र में हुआ हो। जब से हिन्दी भारत की राष्ट्र-भाषा घोषित की गई है, तब से आधुनिक भौतिक विज्ञान के अनेकानेक ग्रन्थ हिन्दी में लिखे जा रहे हैं। इस कार्य में अनेक कठिनाइयाँ सम्मुख आती हैं। पारिभाषिक शब्द ही हजारों की संख्या में गढ़ने पड़ते हैं। परन्तु यह दुःख की बात है कि जहाँ पारिभाषिक शब्दों का कोई सवाल नहीं, जो विद्याएं हमारी पैतृक सम्पत्ति हैं, उनकी भी सरल सुन्दर और विस्तृत व्याख्याएं हिन्दी में आज भी दुष्प्राप्य हैं।
हर्ष का विषय है कि ज्योतिष शास्त्र सम्बन्धी इस कभी को पूरा करने में 'सिंहसदन' नरसिंहपुर के श्री वी० एल० ठाकुर सलमन हैं। उन्होंने अपने "सचित्र ज्योतिष शास्त्र" का प्रथम भाग पूर्ण कर लिया है। इस शास्त्र में स्वयं मुझे रुचि है।
यह सुन्दर ग्रन्थ पढ़ कर मुझे संतोष हुआ। पुस्तक में यथा स्थान अनेक चित्र दिये हैं और यद्यपि ठाकुर साहब ने अनेक भागों का काफी विस्तार से समझाया है, भाषा सरल है और ठाकुर साहब ने इस बात को सदा ध्यान में रखा है कि पुस्तक उनके लिये लिखी जा रही है जिन्होंने पहिले कभी भारतीय ज्योतिष शास्त्र में कोई शिक्षा प्राप्त नहीं की।
आशा है, ठाकुर साहब का यह स्तुत्य प्रयत्न सफल होगा और हिन्दी ससार उनके ज्योतिष शास्त्र को पूर्णतया अपनावेगा।
नागपुर
दिनांक २२ फरवरी १९४४
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कुञ्जीलाल दुबे
उपकुलपति
नागपुर विश्वविद्यालय
लेफ्ट० कर्नल पंडित को० एल० दुबे
वी० ए०, एल-एल० बी०, एम० एल० ए०
वाइस चान्सलर नागपुर यूनिवर्सिटी
व स्पीकर मध्य प्रदेश लेजिसलेटिव असेम्बली
नागपुर म० प्र०