सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 197, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें~ लक बार TP? नमक SIN
कोंटचक्र : १८९
दशा एक-एक वर्ष रहेमी । इसी प्रकार कुण्डली के पूरे १२ भाव में पूरे १२ वर्ष दशा
भोग करेगी इसके पश्चात् फिर लग्न आदि भाव को दशा आरम्भ हो जाती है अर्थात्
१३ वें वर्ष फिर लग्न दशा भा जाती है । यदि किसी की आयु १२० वर्ष की हो तो
इस दशा की १० आवृत्ति हो जायेंगी । १ दशा १ वर्ष रहती है इसकी अन्तर्देशा १-१
मास की होती है । १२ भाव में पूरे १ वर्ष अन्तर्दशा के हो जाते हैं और प्रत्यन्तर्दशा
केवल २॥ दिन की होती है १२ भाव में पूरे ३० दिन (१ मास ) हो जाते हैं । यहाँ
चक्र देखने से स्पष्ट समझ में आ जायगा ।
इसके पश्चात् इसी प्रकार और वर्ष मासादि जोड़कर आगे की दशा या अन्तदंशा
आदि निकाल लेनी चाहिए ।
सुदर्शन चक्र व दिशा का फल विचार
१--जिस भाव व दिशा हो उस भाव का लग्न मानकर उससे तनु घन सहज आदि
१२ भाव क्रम से विचार कर उससे सम्पूर्ण १२ भाव का फल विचारना ।
२--दंशा आरंभ कालिक लग्न से केन्द्र, कोण ओर ८ भाव में शुभ ग्रह हो तो
वह दशा शुभ समझना ।
३--जिस भाव में केवल राहु या केतु हो उस भाव की हानि। ४--जिस भाव में अधिक पाप ग्रह हों उस भाव की हानि ।
५--१२,६ भाव से दूसरे स्थानों में शुभ ग्रह हो तो उस भाव का फल शुभ ४
यदि १२,६ भाव में शुभ ग्रह हो तो उस वर्ष आदि में रोग शत्रु आदि की वृद्धि हो।
६--यदि ३-६-११ भाव में पाप ग्रह हो तो इनका फल शुभ अन्य भाव में पाप
ग्रह हो तो उस भाव की हानि होती है ।
७--इसमें अष्टकवग के अनुसार भी फल विचारना । दोनों प्रकार से शुभ या
अशुभ आवे तो पूर्ण रूप से शुभ या अशुभ फल कहना । इस प्रकार से शुभ दूसरे
प्रकार से अशुभ आवे तो उनके बल का विचार कर फल कहना जिससे फल की
अधिकता हो वह फल कहना ।
कोट चक्र-युद्ध या रोगादि फल जानने को