भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 285

मारक स्थान : २७५

साथ अस्त हो या छठे भाव में हो तो भूख से पीड़ित होकर अपने बंधुओं से रहित

जगह में अर्थात्‌ अकेला मृत्यु पावे [जा० पा०] ।

अन्न से मृत्यु--२- मंगल चतुर्थ में हो, शनि व चन्द्र अष्टम हो तो अन्त से

मृत्यु [जा० पारि०] ।

चारपाई आदि से गिरने से मृत्यु---चन्द्रमा लग्न में हो, निर्बेल सूर्य अष्टम में

हो, लग्न से १२ वें गुरु हो, चतुर्थ में पाप ग्रह हो चारपाई आदि से गिरने से मृत्यु

हो [जा० पा० ]।

मसूरिका रोग या पित्त रोग से मरण--रोहु अष्टम हो पाप ग्रह से दृष्ट हो तो

भसूरिका रोग या पित्त रोग आदि से मरण हो [जा० पा०] ।

माता (चेचक) के कोप से मृत्यु--लग्नेश केतु युक्त पाप ग्रहों के बीच हो और

लग्नेश से अष्टम में पाप ग्रह हों तो माता के कोप से मृत्यु [जा० पारि०]।

पित्त रोग से मरण--अष्टम में निर्बल सूर्य या निर्वेल मंगल हो धन भाव में पाप

ग्रह हों तो पित्त रोग से मरे [जा० पा०] ।

त्रिदोष व्यावि (सन्निपात) से मृत्यु--१-क्रूर ग्रह की राशि, १, ८, १०, ११

राशि में क्रूर ग्रह मंगल शनि राहु केतु से युक्त सूर्य चंद्र तीसरे भाव में हो तो त्रिदोष

से मृत्यु । २- मंगल या शनि की राशि में चन्द्र हो या कन्या राशि में हो और दो

दो पाप ग्रहों के मध्य हों शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो ज्वर अग्नि सन्निपात इन दोषों

से मरे [जा० सं०]।

भगंदर या कुष्ठ से मूत्यु--१- ६ या १० भाव में मंगल और २ या ८ भाव में

चन्द्र हो तो भगंदर या कुष्ठ से मृत्यु हो [जा० सं०] ।

भगंदर या कृमि से मरण--२- क्षीण चन्द्रमा वरिष्ठ हो उस पर मंगल की दृष्टि

हो तो अशे, भगंदर या कुमि रोग होकर मरे [प्रा० यो०]।

चतुथिका से मृत्यु [चौथिया ज्वर ]--९- अष्टम में राहु या केतु हो तो चतुथिका

से मृत्यु हो [स० चि०]। २-अष्टमेश राहु या केतु युक्त होकर अष्टम में क्रूर पष्ठ्यंश

में हो तो उसे चौथिया ज्वर हो जिससे मृत्यु हो [ स० चि० ]। अष्टमेश उच्च का

हो अच्छी योग दृष्टि हो तो साधारण पीड़ा होगी ।

अनेक रोग से मृत्यु--जन्म में क्षीण चन्द्रमा मंगल और शनि अष्टम में या लग्न

चतुर्थं या दशम में हो तो अनेक रोगों से मरे [ जा० भ० ]।

सामूहिक बीमारी से मृत्यु--लग्नेश अष्टमेश के साथ हो ओर भी बहुत ग्रहों से

युक्त हो तो जिस समय बहुत लोगों की मृत्यु हो उसी समय मृत्यु हो जैसे हेजा प्लेग

आदि में होता है [जा० पारि०]।

क्रोध से उत्पन्न हुआ मरण--केन्द्र में लग्नेश दो पाप ग्रहों के वीच हो और

अष्टम में कोई पाप ग्रह हो तो स्व क्रोध से उत्पन्न हुआ मरण हो [जा० सं०]।

लोभ से मरण--लग्न में सूर्य, पंचम में मंगल, अष्टम में शनि ओर नवम में