भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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४१८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

२१. नासाच्छेद योग--शुक्र षष्ठ भाव में हो ओर मंगल लग्न में हो तो नासाच्छे-

दन करने वाला होता है ।

२२. पाद खंज योग--शनि शुक्र से युक्त हो या शुक्र गुरु दोनों एकत्र हों और

कोई शुभ ग्रह उसे न देखता हो तो वह पैर से लंगडा हो ।

२३. सर्प हंता योग--लग्न से सप्तम घर में शनि सूर्य और राहु तीनों हों तो

उसे सोने में सपं काटता है जिससे मृत्यु हो ।

२४. व्याघ्र हृत योग- गुरु के स्थान में बुध हो और शनि के स्थान में मंगल हो

तो २५ वर्षे में वन में सिह से हत होता है ।

२५. असिघात योग- शुक्र के घर में चन्द्र हो या चन्द्र के स्थान ककं में शनि

हो तो २८ वषं में तलवार लगने से मृत्यु हो ।

२६. ब्रह्वाघात--सूयं के साथ मंगल हो और गुरु युक्त शनि हो तो २८ वर्ष में

ब्रह्मघाती हो (जा० सं०) । अन्यमत--सूर्य के साथ मंगल हो या गुरु के साथ शनि

हो तो उपरोक्त फल हो (मान०) ।

२७. पद विच्छेद योग--लग्न में मंगल हो और शनि सूर्य राहु इनसे दुष्टं हो

तो इन्द्र के समान ही क्यों न हो किसी प्राप्त हुए ऊँचे अधिकार के पद से च्युत हो

जाता है।

२०. अथेच्छातो मृत्यु योग--केन्द्र में मंगल, सप्तम घर में राहु हो तो जब अंतः

करण से मरण की इच्छा करे उसी समय मृत्यु हो ।

२९. अल्प मृत्यु योग--छूग्न से सप्तम में चन्द्र हो और पाप ग्रह अष्टमं में हो

तथा शुभ ग्रह लग्न में हो ओर लग्न में सूर्य हो तो बालक एक वर्ष के भीतर मर जावे

( मान० ) । अन्यमत--छग्न से सप्तम में चन्द्र हो, पाप ग्रह अष्टम नवम और लग्न

में हो तो १ वर्ष के अन्त में बालक का मरण हो ( जा० सं० ) ।

३०--पंच अपत्य नाश योग--( संतान नाश योग ) सूर्य के स्थान सिंह में चन्द्र

गुरु स्वस्थानी हो तथा लग्न के विचार से चतु हो सागर योग भी हो तो यह योग

होता है । यह योग संतान नाश करने वाला है ।

३१--दोला योग--सब ग्रह १२, १,,९ इन्हीं ३ घर में हो तो राज्य देने वाला

होता है ( मान० ) । अन्यमत--१२, १, ९ इन राशियों में सब ग्रह हों तो यह योग

राज्य दायक है ( जा० सं० ) ।

३२. केन्द्री गुरु फल--पाप ग्रह से हीन होकर गुरु केन्द्र में हो अर्थात्‌ और कोई

भी पाप ग्रह केन्द्र में न हो केवल गुरु हो । फल--सन्मान, मान गुण इनका पात्र और

सत असत की परीक्षा करने वाला, कलाओं का निधि चतुर, गाने बजाने में कुशल,

मंत्रियों का स्वामी, राज सभा में पंडित होता है ।

३३. कुसुम योग-ळग्न में गुरु सप्तम में चन्द्र, चन्द्र से अष्टम में सूर्य हो तो

भूमिपाल वंघुरक्षक हो, २० वर्ष के भीतर ग्राम अधिकारी हो । ३४. नाग योग--दक्षमेश किसी राशि के अंश चन्द्र में हो और उस राशि का