सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४४० : रविम ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
एक स्थान में ६ बली ग्रह—राज कुल का भी हो तो भी नित्य पर्वत में शिला तल बास कर तपस्या करने वाला होता है।
२—संन्यास योग में राहु युक्त हो या कूर्पाश्वक में गुल्फिक युक्त हो तो संन्यास में विफलता होने है। अर्थात् संन्यास त्याग दे।
३—प्रवज्या कारक ग्रहों में २,३ ग्रह बली हों तो पहिले एक प्रकार की फकीरी लेगा फिर दूसरे प्रकार की, पश्चात् तीसरे प्रकार की। प्रथम जिस ग्रह की अंतर्देशा होगी तब उस ग्रह के अनुसार प्रवज्या होगी दूसरे की अंतर्देशा आने पर पहिली दीक्षा त्याग कर वर्तमान ग्रह की दीक्षा लेगा। इसी प्रकार ग्रहों के प्रभाव से एक छोड़ कर दूसरी ग्रहण करता रहेगा।
४—प्रवज्या कारक बली ग्रह अस्तंगत हो तो अदीक्षित अर्थात् बिना गुरु मंत्रों-पदेश के संन्यास या फकीरी लेगा परन्तु उस सम्प्रदाय में उसकी भक्ति या प्रेम होगा। या मुँह से कहे या विचार करे कि मैं दीक्षा लूँगा परन्तु उसमें प्रेम होते हुए भी दीक्षा न लेवे यदि ग्रह निर्बल हो ( उच्चादि बलहीन हो ) और सूर्य के साथ अस्त हो तो सूर्य जन्म प्रवज्या होगी अर्थात् वह तपस्वी होगा।
५—युद्ध में पराजित ग्रह को—मंगल आदि ग्रहों में एक ही अंश पर ग्रह रहने से ग्रह युद्ध समस्या जाता है। इसमें शुक्र उत्तर या दक्षिण में हो दोनों में विजयी समस्या जाता है अन्य ४ ग्रह बुध गुरु मंगल और शनि में जो उत्तर में रहता है वह जयी समस्या जाता है और दक्षिण वाला पराजित समस्या जाता है इस प्रकार जो ग्रह युद्ध में पराजित हो उसकी प्रवज्या में जातक उस प्रवज्या को ग्रहण कर छोड़ देता है। यदि न पराजित हुआ हो तो बलीग्रह की अंतर्देशा में दीक्षा पावे।
६—राजयोग प्रवज्या योग दोनों बलवान् हों तो वह विरुद्ध फल योग पर साधु होकर भी राजा हो।
७—फर्क ग्रहों में जिसका बल अधिक होगा उसकी दीक्षा पहिले होगी पश्चात् दूसरों की होगी।
८—यदि ग्रह बलवान् हो तो उसकी दीक्षा मरने तक रहे।
यदि ग्रह निर्बल हो तो उसकी दीक्षा लेकर छोड़ देवे।
सब ग्रह बली हों—तो नित्य भोजन त्याग कर नंगा-रह कर योग मार्ग में तत्पर हों।
९—एक स्थान में ५,६ ग्रह हों तो वह दरिद्रों और मूर्ख भी होता है।
१०—अन्यमत है कि प्रवज्या कारक ग्रहों में दशमेक्ष भी होंवे, दशमेक्ष के वर्ग का साधु होगा।
अन्य प्रकार से प्रवज्या योग
१—जन्म समय चन्द्रमा जिस राशि पर रहता है उसका स्वामी जन्मेश कहलाता है। जन्म समय जन्मेश पर किसी ग्रह की दृष्टि न हो और चन्द्रमा शनि को देखे तो प्रवज्या योग होता है इसमें भी शनि चन्द्र में से जो बली हो उसकी अंतर्देशा में प्रवज्या होगी ( बु० जा० )।