सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३८० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
पराक्रमी, नौकरों से युक्त, उदार, निरोग, गुणी, दाता भोर स्वभुजोपाजित घन
चाला (वृ० पा०) ।
( ४ ) चतुर्थ में चतुर्थेश--पिता, राजा, स्वामो, इनका मान करने में तत्पर
पिता से लाभ, स्वघर्म में सावधान तथा सुखी (जा० सं० ) ।
पिता को राज्य से मान कराने वाला, जाति में विदित, पिता द्वारा धन लाभ,
सुधर्म करने वाला, सुखी, घनवान् ( मान )!
राजमंत्री, सबं घन सम्पन्न, चतुर, सुशील, मानी, ज्ञानी, स्त्री का श्रिय, और
सुखी ( वृ० पारा० ) ।
(५) पंचम में चतुर्थेश-पिता के लाभ से भोग वाला, दीर्घायु, राजा से विख्यात, पु
से लाभदायक ( जा० सं० ) । पिता से लाभ, दीर्घायु, कर्तव्यों द्वारा प्रसिद्ध, पुत्रवान्,
पुत्रों का पालक ( मान० ) । सुखी, सबका प्रिय, विष्णु का भवत, गुणी, मानी, स्व
उपाजित घन ( वु० पारि० ) ।
( ६) षष्ठ में चतुर्थेश--पिता के घन का नाशक, पिता से वैर कर्ता, पाप तो
पिता को दोष करने वाला, शुभ हो तो पुत्र घन का संचय करने वाला ( जा० सं० ) ।
थापग्रह--माता के घन का नाशक, पिता के दोषों के करने में रत । शुभ रह
घन का संचय कर्ता ( मान० ) ।
माता के सुख से हीन, क्रोधी, चोर, व्यभिचारी, स्वच्छन्द, दुष्ट हृदय (qe पा०) à
७--सप्तम में चतुर्थेश-पाप ग्रह हो तो सुख से इवसुर को नहीं पाळता, शुभग्रह
हो तो पालनकर्ता । बली हो तो कुलपति हो (जा० सं०) । पापग्रह हो तो स्त्री अपने
इवसुर की सेवा नहीं करती, शुभग्रह हो तो पालन करने वाली होती है ( मान०) ।
बहुत विद्या का ज्ञाता, पैतृक घन को त्यागने वाला, सभा में गुँगा के समान ।
८--अष्टम में चतुर्थेश-ऋर, रोगी, दरिद्र, बुरे कर्म, मृत्यु प्रिय ( जा० सं० ) ।
क्रूर स्वभाव, रोगी, दरिद्र, दुष्कर्म कर्ता, इन्हो सब कारणों से उसे मरना अच्छा लगता
है (मान०) । चर स्त्री आदि के सुख से हीन, माता-पिता से भी अल्प सुख, नपुंसक
समान ( qo पा० )।
९--नवम में चतुर्थेश-सत्संगी, समस्त विद्याओं से युक्त, पिता के धमम का संग्रहकर्ता,
"पिता के तीर्थ का चाहने वाला (ज॥० सं०) । पिता से पृथक-पृथक रहने वाला, समस्त
विद्याओं का ज्ञाता, पितृ घमं का संग्रह कर्ता, पिता के व्यवहार से पृथक (मान०)। सबका
प्रिय, देवो का भक्त, गुणी, मानी, सवंसुख युक्त (qo पा०) ।
१०--दशम में चतुर्थेश-पापग्रह हो तो पुत्र माता को त्याग दे और कन्या का
“प्यारा होता है, पापग्रह हो तो उसको और उसकी माता को छोड़ दे ओर दूसरी कन्या
से विवाह कर छेता है । शुभग्रह हो तो अन्य विवाह न करने वाला एवं दूसरी स्त्री के
साथ रहने वाला हो (मान०)। राजमान्य, रसायन ज्ञाता, अति प्रसन्न, सुखी,
जितेन्द्रिय (वृ० पा० )1