सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभावेश का भिन्न-भिन्न भावों में फल : ३९७
होकर केन्द्र या कोण में हो और अपने स्वस्थान या उच्च तो सबका मान करे, अति प्रसिद्ध हो, सदा सत्कमं राजा सदृश हो वह दीघंजीवी हो ( फल० )।
(२) घैयं युक्त कार्य करने में--दशमेश सुस्थित हो तो वह अपने प्रताप और बाहु बल से बहुत धैय युक्त कार्य को पूरा करने में समथं होगा ( फछ० ) 1 ( ३ ) अच्छे कर्म नहीं = दशमेश वल्होन हो ता अच्छे कर्म नहीं होते । (४) शत्रु नीच या ६-८-१२ घरों को छोड़ कर कर्मेश शुभ फल दायक होता है । ११--लाभेश का भिन्न-भिन्न भाव में फल १) लग्न में लाभेश--अल्पायु बल से युक्त, शूर वीर दानी, जन प्रिय, सुंदर अधिक तृष्णा के दोष से मृत्यु ( मान० ) अल्पायु बहुतसी कलाओं से युक्त, शूरवीर, दान कर्ता, जनों का प्रिय, सुंदर ऐश्वर्य सम्पन्न, तृषा रोग से मरण ( जा० पा०) 1 सात्विक, घनो, सुखो, सम दृष्टि, कवि, वक्ता, सदा लाभ ( बु० पा०)।
(२) घन में लामेश--उत्तम भोगी, अल्प भोजी, अल्पायु, अर्घ कपालो से रोगवान्, शुभ ग्रह हो तो घन से परिपूगं (मान०) । उत्तम पात्र का भोगने वाला, थोड़े पात्र वाला,
अल्पायु, दरिद्री, चोर हो यदि पाप ग्रह हो । शुभ ग्रह हो तो घन से युक्त (जा० qo) । सत्र धन से युक्त, सब कमं में सिद्धि पाने वाला, धर्मात्मा, सुखो (go पा०) ।
(३) सहज में लाभेश--भाई बंघु तथा स्त्री का पालन कर्ता, सत्पात्र वांधव, बंधु-
जनों का वत्सल, सुंदर भाई बंधुओं के शत्रु कुल का नाश करने वाला (मान०) । शुभ
ग्रह हो तो बंधु लक्ष्मी का पालन कर्ता, अच्छे बांधवों से युक्त बांघवो पर स्नेह, पाप ग्रह. हो तो बंधुजनों का शत्रु समान नाशक (जा० सं०) । सब कायं में दक्ष, सहोदर से सुखी, कदाचित् शूल रोग से पीड़ित (qo पा०) 1
(४) सुख में छाभेश--दीर्घायु, पिता में भक्ति, समयोचित कमं करने में प्रवीण,
स्वघमं करने में रत और लाभ से युक्त (मान०)। दीर्घायु, पिता का भक्त, प्राप्ति
करने के कारण से युक्ति और सुकमं से लाभ (जा० सं०) । मातु कुछ से घन पाने वाला, तीथं करने वाला, घर भूमि के सुख से युक्त (go पा०) ।
(५) पंचम में लामेश--पिता पुत्र में परस्पर स्नेह, पुत्र समान गुण वाळे, अल्पायु
(मान०) । पिता पुत्र दोनों स्नेह युक्त, पिता पुत्र दोनों समान गुण वाले, पिता पुत्र दोनों में पुत्र तृष्णाजीवो होता है (जा० सं०) । उसके पुत्र सुखी, विद्वान्, सुशील होत हैँ और
स्वयं धर्मात्मा और सुखी होता हे (qo पा०) ।
(६) पष्ठ में छामेश--राजयद्ष्मा आदि अधिक काल तक रहने वाला रोग, प्रवल
बैरी जनों से युक्त, क्रुर हो तो परदेश में चोर के हाथ से मृत्यु (मान०)। बैर,
अति दोघं रोग, चतुरंग सेना के संग्रह को प्राप्त, चोर बे हाथ मरण, पाप ग्रह हो तो देशान्तर जाने वाला, रोगी, क्रूरबुद्धि, विदेश वासी, शत्रुओं से पीड़ित (go पा०) 1
७--सप्तम में लामेश-तेंजस्वी, शील सम्पत्ति युक्त, 5त्तमाधिकारी, दीर्घायु, एक ही
पत्नी वाला (मान०) । तेजस्वी, शील, सम्पदाओं से युक्त पद वाला, दीर्घायु, एक स्त्री का
पत्ति (जा० सं०)। स्त्री से कुछ घन लाभ, उदार गुणी, कामी, स्त्रं के वश (बू० पा०) ।
८--अष्टम में लामेश--पाप गृह हो तो अल्पायु, राजरोगी, रोग के कारण जोवित
में हो या लग्नेश दशम में हो
र करने की ओर झुकाव रहे, भाग्य