श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1004, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १८ ]
- साधक-संजीवनी *
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परिशिष्ट भाव —पुरुषोत्तमको 'अन्य' कहनेका तात्पर्य है कि क्षर और अक्षर तो लौकिक हैं, पर पुरुषोत्तम दोनोंसे विलक्षण अर्थात् अलौकिक हैं। अतः परमात्मा विचारके विषय नहीं हैं, प्रत्युत श्रद्धा-विश्वासके विषय हैं। परमात्माके होनेमें भक्त, सन्त-महात्मा, वेद और शास्त्र ही प्रमाण हैं। 'अन्य' का खुलासा भगवान्ने आगेके श्लोकमें किया है।
'यो लोकत्रयमाविश्य'' —इन पदोंमें बारहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतकका भाव आ गया है। मनुष्यका कर्तव्य तो मनुष्यलोकमें है, पर भगवान्का कर्तव्य तीनों लोकोंमें है। वास्तवमें भगवान्का अपना कोई कर्तव्य नहीं है, फिर भी वे केवल जीवोंके हितके लिये कर्तव्य करते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका बाईसवाँ, तेईसवाँ और चौबीसवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें वर्णित उत्तम पुरुषके साथ अपनी एकता बताकर अब साकाररूपसे प्रकट भगवान् श्रीकृष्ण अपना अत्यन्त गोपनीय रहस्य प्रकट करते हैं।
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥
| यस्मात् | = कारण कि | अक्षरात् | = अक्षरसे | च | = और |
|---|---|---|---|---|---|
| अहम् | = मैं | अपि | = भी | वेदे | = वेदमें |
| क्षरम् | = क्षरसे | उत्तमः | = उत्तम हूँ, | पुरुषोत्तमः | = 'पुरुषोत्तम' (नामसे) |
| अतीतः | = अतीत हूँ | अतः | = इसलिये | प्रथितः | = प्रसिद्ध |
| च | = और | लोके | = लोकमें | अस्मि | = हूँ। |
व्याख्या—'यस्मात्क्षरमतीतोऽहम्' —इन पदोंमें भगवान्का यह भाव है कि क्षर (प्रकृति) प्रतिक्षण परिवर्तनशील है और मैं नित्य-निरन्तर निर्विकाररूपसे ज्यों-का-त्यों रहनेवाला हूँ। इसलिये मैं क्षरसे सर्वथा अतीत हूँ।
शरीरसे पर (व्यापक, श्रेष्ठ, प्रकाशक, सबल, सूक्ष्म) इन्द्रियाँ हैं, इन्द्रियोंसे पर मन है और मनसे पर बुद्धि है (गीता—तीसरे अध्यायका बयालीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार एक-दूसरेसे पर होते हुए भी शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि एक ही जातिके, जड़ हैं। परन्तु परमात्मतत्त्व इनसे भी अत्यन्त पर है; क्योंकि वह जड़ नहीं है, प्रत्युत चेतन है।
'अक्षरादपि चोत्तमः' —यद्यपि परमात्माका अंश होनेके कारण जीवात्मा-(अक्षर-) की परमात्मासे तात्त्विक एकता है, तथापि यहाँ भगवान् अपनेको जीवात्मासे भी उत्तम बताते हैं। इसके कारण ये हैं—(१) परमात्माका अंश होनेपर भी जीवात्मा क्षर-(जड़ प्रकृति-) के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक) और प्रकृतिके गुणोंसे मोहित हो जाता है, जबकि परमात्मा (प्रकृतिसे अतीत होनेके कारण) कभी मोहित नहीं होते (गीता—सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। (२) परमात्मा प्रकृतिको अपने अधीन करके लोकमें
आते, अवतार लेते हैं (गीता—चौथे अध्यायका छठा श्लोक), जबकि जीवात्मा प्रकृतिके वशमें होकर लोकमें आता है (गीता—आठवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। (३) परमात्मा सदैव निलिप्त रहते हैं, (गीता—चौथे अध्यायका चौदहवाँ और नवें अध्यायका नवाँ श्लोक), जबकि जीवात्माको निलिप्त होनेके लिये साधन करना पड़ता है (गीता—चौथे अध्यायका अठारहवाँ और सातवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक)।
भगवान्द्वारा अपनेको क्षरसे 'अतीत' और अक्षरसे 'उत्तम' बतानेसे यह भाव भी प्रकट होता है कि क्षर और अक्षर—दोनोंमें भिन्नता है। यदि उन दोनोंमें भिन्नता न होती, तो भगवान् अपनेको या तो उन दोनोंसे ही अतीत बताते या दोनोंसे ही उत्तम बताते। अतः यह सिद्ध होता है कि जैसे भगवान् क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम हैं, ऐसे ही अक्षर भी क्षरसे अतीत और उत्तम है।
'अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः' —यहाँ 'लोके' पदका अर्थ है—पुराण, स्मृति आदि शास्त्र। शास्त्रोंमें भगवान् 'पुरुषोत्तम' नामसे प्रसिद्ध हैं।
शुद्ध ज्ञानका नाम 'वेद' है, जो अनादि है। वही ज्ञान आनुपूर्वीरूपसे ऋक्, यजुः आदि वेदोंके रूपसे प्रकट हुआ है। वेदोंमें भी भगवान् 'पुरुषोत्तम' नामसे प्रसिद्ध हैं।