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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

जब साधकका उद्देश्य एकमात्र परमात्मप्राप्तिका ही हो जाता है, तब उसकी कामनाएँ दूर होती चली जाती हैं। कारण कि सांसारिक भोग और संग्रह साधकका लक्ष्य नहीं होता। अतः वह सांसारिक भोग और संग्रहकी कामनाका त्याग करते हुए अपने साधनमें आगे बढ़ता रहता है।

‘शान्तिः’—अन्तःकरणमें राग-द्वेषजनित हलचलका न होना ‘शान्ति’ है; क्योंकि संसारके साथ राग-द्वेष करनेसे ही अन्तःकरणमें अशान्ति आती है और उनके न होनेसे अन्तःकरण स्वाभाविक ही शान्त, प्रसन्न रहता है।

अनुकूलतासे पुराने पुण्योंका नाश होता है और उसमें अपना स्वभाव सुधरनेकी अपेक्षा बिगड़नेकी सम्भावना अधिक रहती है। परन्तु प्रतिकूलता आनेपर पापोंका नाश होता है और अपने स्वभावमें भी सुधार होता है। इस बातको समझनेपर प्रतिकूलतामें भी स्वतः शान्ति बनी रहती है।

किसी परिस्थिति आदिको लेकर साधकमें कभी राग-द्वेषका भाव हो भी जाता है तो उसके मनमें अशान्ति पैदा हो जाती है और अशान्ति होते ही वह तुरंत सावधान हो जाता है कि राग-द्वेषपूर्वक कर्म करना मेरा उद्देश्य नहीं है। इस विचारसे फिर शान्ति आ जाती है और समय पाकर स्थिर हो जाती है।

‘अपैशुनम्’—किसीके दोषको दूसरेके आगे प्रकट करके दूसरोंमें उसके प्रति दुर्भाव पैदा करना पिशुनता है और इसका सर्वथा अभाव ही ‘अपैशुन’ है। परमात्मप्राप्तिका ही उद्देश्य होनेसे साधक कभी किसीकी चुगली नहीं करता। ज्यों-ज्यों उसका साधन आगे बढ़ता चला जाता है, त्यों-ही-त्यों उसकी दोषदृष्टि और द्वेषवृत्ति मिटकर दूसरोंके प्रति उसका स्वतः ही अच्छा भाव होता चला जाता है। उसके मनमें यह विचार भी नहीं आता कि मैं साधन करनेवाला हूँ और ये दूसरे (साधन न करनेवाले) साधारण मनुष्य हैं, प्रत्युत तत्परतासे साधन होनेपर उसे जैसी अपनी स्थिति (जड़तासे सम्बन्ध न होना) दिखायी देती है, वैसी ही दूसरोंकी स्थिति भी दिखायी देती है कि वास्तवमें उनका भी जड़तासे सम्बन्ध नहीं है, केवल सम्बन्ध माना हुआ है। इस तरह जब उसकी दृष्टिमें किसीका भी जड़तासे सम्बन्ध है ही नहीं, तो वह किसीका

दोष किसीके प्रति क्यों प्रकट करेगा?

भक्तिमार्गवाला सर्वत्र अपने प्रभुको देखता है, ज्ञानमार्गवाला केवल अपने स्वरूपको ही देखता है और कर्मयोगमार्गवाला अपने सेव्यको देखता है। इसलिये साधक किसीकी बुराई, निन्दा, चुगली आदि कर ही कैसे सकता है?

‘दया भूतेषु’—दूसरोंको दुःखी देखकर उनका दुःख दूर करनेकी भावनाको ‘दया’ कहते हैं। भगवान्की, संत-महात्माओंकी, साधकोंकी और साधारण मनुष्योंकी दया अलग-अलग होती है—

(१) भगवान्की दया—भगवान्की दया सभीको शुद्ध करनेके लिये होती है। भक्तलोग इस दयाके दो भेद मानते हैं—कृपा और दया। मात्र मनुष्योंको पापोंसे शुद्ध करनेके लिये उनके मनके विरुद्ध (प्रतिकूल) परिस्थितिको भेजना ‘कृपा’ है और अनुकूल परिस्थितिको भेजना ‘दया’ है।

(२) संत-महात्माओंकी दया—संत-महात्मालोग दूसरोंके दुःखसे दुःखी और दूसरोंके सुखसे सुखी होते हैं—‘पर दुख दुख सुख सुख देखे पर’ (मानस ७।३८।१)। पर वास्तवमें उनके भीतर न दूसरोंके दुःखसे दुःख होता है और न अपने दुःखसे ही दुःख होता है। कारण कि तत्त्वमें न सुख है, न दुःख। जैसे समुद्रके ऊपर लहरें उठती दीखती हैं, पर समुद्रके भीतर कोई लहर नहीं होती, भीतरसे समुद्र शान्त (सम) रहता है, ऐसे ही व्यवहारमें सन्त दुःखी होते हुए दीखते हैं, पर उनके भीतर न सुख है, न दुःख। तात्पर्य है कि वास्तवमें वे दुःखी नहीं होते, प्रत्युत उनके द्वारा दूसरेका दुःख दूर करनेकी चेष्टा होती है। अपनेपर प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर वे उसमें भगवान्की कृपाको देखते हैं, पर दूसरोंपर दुःख आनेपर उन्हें सुखी करनेके लिये वे उनके दुःखको स्वयं अपनेपर ले लेते हैं। जैसे, इन्द्रने क्रोधपूर्वक बिना अपराधके दधीचि ऋषिका सिर काट दिया था, पर जब इन्द्रने अपनी रक्षाके लिये उनकी हड्डियाँ माँगीं, तब दधीचिने सहर्ष प्राण छोड़कर उन्हें अपनी हड्डियाँ दे दीं। इस प्रकार संत-महापुरुष दूसरेके दुःखको सह नहीं सकते, प्रत्युत उन्हें सुख पहुँचानेके लिये अपनी सुख-सामग्री और प्राणतक दे देते हैं, चाहे दूसरा उनका अहित करनेवाला ही क्यों न हो!* इसलिये संत-

  • कर्णस्वचं शिबिर्यासं जीवं जीमूतवाहनः। ददौ दधीचिरस्थीनि नास्त्यदेयं महात्मनाम्॥

‘कर्णने अपनी त्वचा, शिबिने अपना मांस, दधीचिने अपनी हड्डियाँ और जीमूतवाहने अपना जीवन (शरीर) दे दिया। सच है, महात्माओंके लिये (परहितके लिये) कुछ भी अदेय नहीं है।’