श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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बड़पनका अनुभव होता है, उसका नाम 'अभिमान' है। जैसे—मैं जाति-पाँतमें कुलीन हूँ; मैं वर्ण-आश्रममें ऊँचा हूँ; हमारी जातिमें हमारी प्रधानता है; गाँवभरमें हमारी बात चलती है अर्थात् हम जो कह दूँगे, उसको सभी मानेंगे; हम जिसको सहरा देंगे, उस आदमीसे विरुद्ध चलनेमें सभी लोग भयभीत होंगे और हम जिसके विरोधी होंगे, उसका साथ देनेमें भी सभी लोग भयभीत होंगे; राजदरबारमें भी हमारा आदर है, इसलिये हम जो कह दूँगे, उसे कोई टालेगा नहीं; हम न्याय-अन्याय जो कुछ भी करेंगे, उसको कोई टाल नहीं सकता, उसका कोई विरोध नहीं कर सकता; मैं बड़ा विद्वान् हूँ, मैं अणिमा, महिमा, गरिमा आदि सिद्धियोंको जानता हूँ, इसलिये सारे संसारको उथल-पुथल कर सकता हूँ, आदि-आदि।
‘क्रोधः’ —दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये अन्तः-करणमें जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है, उसका नाम ‘क्रोध’ है।
मनुष्यके स्वभावके विपरीत कोई काम करता है तो उसका अनिष्ट करनेके लिये अन्तःकरणमें उत्तेजना होकर जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है, वह क्रोध है। क्रोध और शोभमें अन्तर है। बच्चा उद्दण्डता करता है, कहना नहीं मानता, तो माता-पिता उत्तेजनामें आकर उसको ताड़ना करते हैं—यह उनका ‘शोभ’ (हृदयकी हलचल) है, क्रोध नहीं। कारण कि उनमें बच्चेका अनिष्ट करनेकी भावना होती ही नहीं, प्रत्युत बच्चेके हितकी भावना होती है। परंतु यदि उत्तेजनामें आकर दूसरेका अनिष्ट, अहित करके उसे दुःख देनेमें सुखका अनुभव होता है, तो यह ‘क्रोध’ है। आसुरी प्रकृतिवालोंमें यही क्रोध होता है।
क्रोधके वशीभूत होकर मनुष्य न करनेयोग्य काम भी कर बैठता है, जिसके फलस्वरूप स्वयं उसको पश्चाताप करना पड़ता है। क्रोधी व्यक्ति उत्तेजनामें आकर दूसरोंका अपकार तो करता है, पर क्रोधसे स्वयं उसका अपकार कम नहीं होता; क्योंकि अपना अनिष्ट किये बिना क्रोधी व्यक्ति दूसरेका अनिष्ट कर ही नहीं सकता। इसमें भी एक मर्मकी
बात है कि क्रोधी व्यक्ति जिसका अनिष्ट करता है, उसका किन्हीं दुष्कर्मोंका जो फल भोगरूपसे आनेवाला है, वही होता है अर्थात् उसका कोई नया अनिष्ट नहीं हो सकता; परंतु क्रोधी व्यक्तिका दूसरेका अनिष्ट करनेकी भावनासे और अनिष्ट करनेसे नया पाप-संग्रह हो जायगा तथा उसका स्वभाव भी बिगड़ जायगा। यह स्वभाव उसे नरकोंमें ले जानेका हेतु बन जायगा और वह जिस योनिमें जायगा, वही उसे दुःख देगा।
क्रोध स्वयंको ही जलाता है। क्रोधी व्यक्तिकी संसारमें अच्छी ख्याति नहीं होती, प्रत्युत निन्दा ही होती है। खास अपने घरके आदमी भी क्रोधसे डरते हैं। इसी अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें भगवान्ने क्रोधको नरकोंका दरवाजा बताया है। जब मनुष्यके स्वार्थ और अभिमानमें बाधा पड़ती है, तब क्रोध पैदा होता है। फिर क्रोधसे सम्मोह, सम्मोहसे स्मृतिविश्रम, स्मृतिविश्रमसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे मनुष्यका पतन हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)।
‘पारुष्यम्’ —कठोरताका नाम ‘पारुष्य’ है। यह कई प्रकारका होता है; जैसे—शरीरसे अकड़कर चलना, टेढ़े चलना—यह शारीरिक पारुष्य है। नेत्रोंसे टेढ़ा-टेढ़ा देखना—यह नेत्रोंका पारुष्य है। वाणीसे कठोर बोलना, जिससे दूसरे भयभीत हो जायें—यह वाणीका पारुष्य है। दूसरोंपर आफत, संकट, दुःख आनेपर भी उनकी सहायता न करके राजी होना आदि जो कठोर भाव होते हैं, यह हृदयका पारुष्य है।
जो शरीर और प्राणोंके साथ एक हो गये हैं, ऐसे मनुष्योंको यदि दूसरोंकी क्रिया, वाणी बुरी लगती है, तो उसके बदलेमें वे उनको कठोर वचन सुनाते हैं, दुःख देते हैं और स्वयं राजी होकर कहते हैं कि ‘आपने देखा कि नहीं? मैंने उसके साथ ऐसा कड़ा व्यवहार किया कि उसके दाँत खुट्टे कर दिये! अब वह मेरे साथ बोल सकता है क्या?’ यह सब व्यवहारका पारुष्य है।
स्वार्थबुद्धिकी अधिकता रहनेके कारण मनुष्य अपना
१-जहाँ अभिमान और दर्प—दोनोंमेंसे कोई एक आता है, वहाँ अभिमानके ही अन्तर्गत दर्प और दर्पके ही अन्तर्गत अभिमान आ जाता है। परन्तु जहाँ ये दोनों एक साथ स्वतन्त्ररूपसे आते हैं, वहाँ दोनोंमें थोड़ा अन्तर हो जाता है। ‘ममता’ की चीजोंको लेकर ‘दर्प’ और ‘अहंता’ की चीजोंको लेकर ‘अभिमान’ कहा जाता है अर्थात् बाहरी चीजोंको लेकर अपनेमें जो बड़पन दीखता है, वह ‘दर्प’ है और विद्या, बुद्धि आदि भीतरी चीजोंको लेकर अपनेमें जो बड़पन दीखता है, वह ‘अभिमान’ है।
२-क्रोधो हि शत्रुः प्रथमो नराणां देहस्थितो देहविनाशनाय। यथास्थितः काष्ठगोते हि वहिनः स एव वहिन्दर्हते शरीरम्॥ ‘क्रोध ही मनुष्यका प्रथम शत्रु है, जो देहमें स्थित होकर देहका ही विनाश करता है। जैसे लकड़ीमें स्थित अग्नि लकड़ीको ही जलाती है, ऐसे ही देहमें स्थित क्रोधरूपी अग्नि देहको ही जलाती है।’