सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1031, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1031

१०३०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

(१।४५)। वे युद्ध-क्षेत्रमें भी भगवान्से बार-बार अपने कल्याणकी बात पूछते हैं—‘यच्छ्रेयः स्यानिश्चितं बृहि तन्मे’ (२।७); ‘तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमानुयायम्’ (३।२); ‘यच्छ्रेय एतयोरैकं तन्मे बृहि सुनिश्चितम्’ (५।१)। यह उनमें दैवी-सम्पत्ति होनेके कारण ही है। इसके विपरीत जिनमें आसुरी-सम्पत्ति है, ऐसे दुर्गंधन आदिमें राज्य और धनका इतना लोभ है कि वे कुटुम्बके नाशसे होनेवाले पापकी तरफ देखते ही नहीं (पहले अध्यायका अड़तीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार अर्जुनमें दैवी-सम्पत्ति आरम्भसे ही थी। मोहरूप आसुरी-सम्पत्ति तो उनमें आगन्तुक रूपसे आयी थी, जो आगे चलकर भगवान्की कृपासे नष्ट हो गयी—‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रासादामयाच्युत’ (१८।७३)। इसलिये यहाँ भगवान् कहते हैं कि ‘भैया अर्जुन! तू चिन्ता मत कर; क्योंकि तू दैवी-सम्पत्तिको प्राप्त है।’

अर्जुनको अपनेमें दैवी-सम्पत्ति नहीं दीखती, इसलिये भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तुम्हारेमें दैवी-सम्पत्ति प्रकट है। कारण कि जो श्रेष्ठ पुरुष होते हैं, उनको अपनेमें अच्छे गुण नहीं दीखते और अवगुण उनमें रहते नहीं। अपनेमें गुण न दीखनेका कारण यह है कि उनकी गुणोंके साथ अभिन्नता होती है। जैसे आँखमें लगा हुआ अंजन आँखको नहीं दीखता; क्योंकि वह आँखके साथ एक हो जाता है, ऐसे ही दैवी-सम्पत्तिके साथ अभिन्नता होनेपर गुण नहीं दीखते। जबतक अपनेमें गुण दीखते हैं, तबतक गुणोंके साथ एकता नहीं हुई है। गुण तभी दीखते हैं, जब वे अपनेसे कुछ दूर होते हैं। अतः भगवान् अर्जुनको आश्वासन देते हैं कि तुम्हारेमें दैवी-सम्पत्ति स्वाभाविक है, भले ही वह तुम्हें न दीखे; इसलिये तुम चिन्ता मत करो।

मार्मिक बात

भगवान्ने कृपा करके मानवशरीर दिया है, तो उसकी सफलताके लिये अपने भावों और आचरणोंका विशेष ध्यान रखना चाहिये। कारण कि शरीरका कुछ पता नहीं कि कब प्राण चले जायें। ऐसी अवस्थामें जल्दी-से-जल्दी अपना उद्धार करनेके लिये दैवी-सम्पत्तिका आश्रय और

आसुरी-सम्पत्तिका त्याग करना बहुत आवश्यक है।

दैवी-सम्पत्तिमें ‘देव’ शब्द परमात्माका वाचक है और उनकी सम्पत्ति ‘दैवी-सम्पत्ति’ कहलाती है—‘देवस्येयं दैवी’। परमात्माका ही अंश होनेसे जीवमें दैवी-सम्पत्ति स्वतः-स्वाभाविक है। जब जीव अपने अंशी परमात्मासे विमुख होकर जड़ प्रकृतिके सम्मुख हो जाता है अर्थात् उत्पत्ति-विनाशशील शरीरादि पदार्थोंका संग (तादात्म्य) कर लेता है, तब उसमें आसुरी-सम्पत्ति आ जाती है। कारण कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, दम्भ, द्वेष आदि जितने भी दुर्गुण-दुराचार हैं, वे सब-के-सब नाशवान्के संगसे ही पैदा होते हैं। जो प्राणोंको बनाये रखना चाहते हैं, प्राणोंमें ही जिनकी रति है, ऐसे प्राणपोषणपरायण लोगोंका वाचक ‘असुर’ शब्द है—‘असुरा प्राणेषु रमन्ते इति असुराः’। इसलिये ‘मैं सुखपूर्वक जीता रहूँ’—यह इच्छा आसुरी-सम्पत्तिका खास लक्षण है।

दैवी और आसुरी-सम्पत्ति सब प्राणियोंमें पायी जाती है (गीता—सोलहवें अध्यायका छठा श्लोक)। ऐसा कोई भी साधारण प्राणी नहीं है, जिसमें ये दोनों सम्पत्तियाँ न पायी जाती हों। हाँ, इसमें जीवनमुक्त, तत्त्वज्ञ महापुरुष तो आसुरी-सम्पत्तिसे सर्वथा रहित हो जाते हैं*, पर दैवी-सम्पत्तिसे रहित कभी कोई हो ही नहीं सकता। कारण कि जीव ‘देव’ अर्थात् परमात्माका सनातन अंश है। परमात्माका अंश होनेसे इसमें दैवी-सम्पत्ति रहती ही है। आसुरी-सम्पत्तिकी मुख्यता होनेसे दैवी-सम्पत्ति दब-सी जाती है, मिटती नहीं; क्योंकि सत्-वस्तु कभी मिट नहीं सकती। इसलिये कोई भी मनुष्य सर्वथा दुर्गुणी-दुराचारी नहीं हो सकता, सर्वथा निर्दयी नहीं हो सकता, सर्वथा असत्यवादी नहीं हो सकता, सर्वथा व्यभिचारी नहीं हो सकता। जितने भी दुर्गुण-दुराचार हैं, वे किसी भी व्यक्तिमें सर्वथा हो ही नहीं सकते। कोई भी, कभी भी, कितना ही दुर्गुणी-दुराचारी क्यों न हो, उसके साथ आंशिक सदगुण-सदाचार रहेंगे ही। दैवी-सम्पत्ति प्रकट होनेपर आसुरी-सम्पत्ति मिट जाती है; क्योंकि दैवी-सम्पत्ति परमात्माकी होनेसे अविनाशी है और आसुरी-सम्पत्ति संसारकी होनेसे नाशवान् है।

  • जीवनमुक्त महापुरुष नाशवान्से असंग होकर अविनाशी परमात्मामें स्थित हो जाते हैं। इसलिये उनमें जीनेकी आशा और मरनेका भय नहीं रहता। सत्स्वरूप परमात्मामें स्थित होनेसे उनमें सदगुण-सदाचार स्वतः-स्वाभाविक रहते हैं। वे सिद्ध महापुरुष तो दैवी-सम्पत्तिसे ऊपर उठे रहते हैं। अतः उनमें दैवी-सम्पत्तिके गुण स्वाभाविक होते हैं, जो साधकोंके लिये आदर्श होते हैं।