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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1034

श्लोक ५ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०३३

सुख-दुःखका भोक्ता केवल जड-अंश नहीं बन सकता। परिणामका ज्ञाता चेतन ही भोक्ता बनता है। जितनी क्रियाएँ होती हैं, सब प्रकृतिमें होती हैं (तीसरे अध्यायका सताईसवाँ और तेरहवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक), पर तादात्म्यके कारण चेतन उन्हें अपनेमें मान लेता है कि मैं कर्ता हूँ। तादात्म्यमें चेतन (परमात्मा)-की इच्छामें चेतनकी मुख्यता और जड-(संसार- ) की इच्छामें जडकी मुख्यता रहती है। जब चेतनकी मुख्यता रहती है, तब दैवी-सम्पत्ति आती है और जब जडकी मुख्यता रहती है, तब आसुरी-सम्पत्ति आती है। जडसे तादात्म्य रहनेपर भी सत्, चित् और आनन्दकी इच्छा चेतनमें ही रहती है। संसारकी ऐसी कोई इच्छा नहीं है, जो इन तीन (सदा रहना, सब कुछ जानना और सदा सुखी रहना) इच्छाओंमें सम्मिलित न हो। इससे गलती यह होती है कि इन इच्छाओंकी पूर्ति जड-(संसार- ) के द्वारा करना चाहता है।

जडको और आसुरी-सम्पत्तिको स्वयं-(चेतन- ) ने स्वीकार किया है। जडमें यह ताकत नहीं है कि वह स्वयंके साथ स्थिर रह जाय। जडमें तो हरदम परिवर्तन होता रहता है। चेतन उसको न पकड़े, तो वह अपने-आप छूट जायगा। कारण कि चेतनमें कभी विकार नहीं होता। वह सदा ज्यों-का-त्यों रहता है। पर असत् प्रकृति नित्य-निरन्तर, हरदम बदलती रहती है। वह कभी एकरूप रह ही नहीं सकती। चेतनने प्रकृतिके साथ सम्बन्ध स्वीकार कर लिया। उस सम्बन्धकी सत्ता यह 'मैं' और 'मेरे'-रूपसे स्वीकार कर लेता है। अतः जडका सम्बन्ध और उससे पैदा होनेवाली आसुरी-सम्पत्ति आगन्तुक है। यदि यह स्वयंमें होती, तो इसका कभी नाश नहीं होता; क्योंकि स्वयंका कभी नाश नहीं होता और आसुरी-सम्पत्तिके त्यागकी बात ही नहीं होती। अनित्य होनेपर भी चेतनके सम्बन्धसे यह नित्य दीखने लगती है। अविनाशीके सम्बन्धसे विनाशी भी अविनाशीकी तरह दीखने लगता है। इसलिये जिस मनुष्यमें आसुरी-सम्पत्ति होती है, वह आसुरी-सम्पत्तिका त्याग कर सकता है और कल्याणका आचरण करके परमात्माको प्राप्त हो सकता है (सोलहवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)।

परमात्माके सम्मुख होते ही आसुरी-सम्पत्ति मिटने

लगती है—

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥

(मानस ५। ४४। ११)

कारण कि 'जन्म कोटि अघ' प्रकृतिसे सम्बन्ध स्वीकार करनेसे ही हुए हैं। प्रकृतिको स्वीकार न करें, तो फिर कैसे जन्म-मरण होगा? जन्म-मरणमें कारण प्रकृतिसे सम्बन्ध ही है—'कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिजन्मसु' (गीता १३। २१)। परन्तु जीवात्मा प्रकृतिकी क्रियाको अपनेमें मान लेता है और प्रकृतिके कार्य शरीरमें मैं-मेरापन कर लेता है, जिससे जन्मता-मरता रहता है। वास्तवमें यह कर्ता भी नहीं है और लिप्त भी नहीं है—'शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते' (१३। ३१)। इस वास्तविकताका अनुभव करना ही 'कर्ममें अकर्म' तथा 'अकर्ममें कर्म' देखना है। इन दोनों बातोंका अभिप्राय यह है कि कर्म करते हुए भी यह सर्वथा निलिप्त तथा अकर्ता है और निलिप्त तथा अकर्ता रहते हुए ही यह कर्म करता है अर्थात् कर्म करते समय और कर्म न करते समय यह (आत्मा) नित्य-निरन्तर निलिप्त तथा अकर्ता रहता है। इस वास्तविकताका अनुभव करनेवाला ही मनुष्योंमें बुद्धिमान् है (चौथे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। जिसमें कर्तापनका भाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें लिप्तता नहीं है अर्थात् कोई भी कामना नहीं है, वह यदि सब प्राणियोंको मार दे, तो भी पाप नहीं लगता (अठारहवें अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)। अर्जुनने पूछा कि मनुष्य किससे प्रेरित होकर पाप करता है? तो भगवान्ने कहा—कामनासे (तीसरे अध्यायका छत्तीसवाँ-सैंतीसवाँ श्लोक)। कामनाके कारण ही सब पाप होते हैं। शरीरके तादात्म्यसे भोग और संग्रहकी कामना होती है*। अतः जडका संग (महत्त्व) ही सम्पूर्ण पापोंका—आसुरी-सम्पत्तिका कारण है। जडका संग न हो, तो दैवी-सम्पत्ति स्वतःसिद्ध है।

अर्जुन साधकमात्रके प्रतिनिधि है। इसलिये अर्जुनके निमित्तसे भगवान् साधकमात्रको आश्वासन देते हैं कि चिन्ता मत करो; अपनेमें आसुरी-सम्पत्ति दीख जाय, तो घबराओ मत; क्योंकि तुम्हारेमें दैवी-सम्पत्ति स्वतः-स्वाभाविक विद्यमान है—

  • कोई भी मनुष्य अपनेको दोषी बनाना पसंद नहीं करता; क्योंकि इस लोकमें दोषीका अपमान, तिरस्कार और निन्दा होती है तथा परलोकमें चौरासी लाख योनियाँ तथा नरक भोगने पड़ते हैं। परन्तु मनुष्य नाशवान् जडके संगसे पैदा हुई कामनाके वशीभूत होकर न करनेलायक शास्त्र-निषिद्ध क्रिया कर बैठता है। अतः उस क्रियाका परिणाम कर्ता ( मनुष्य )-की रुचिके ( मैं निर्दोष रहूँ—इसके ) अनुसार नहीं होता और कर्ता—( अपनी रुचिके विरुद्ध ) दोषी तथा पापी बन जाता है।