श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २८ ]
- साधक-संजीवनी *
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उपजा ग्यान चरन तब लागी । लीन्हंसि परम भगति बर माँगौ ॥
(मानस, किष्किन्धा० ११। २-३)
विचार करना चाहिये कि जब चौरासी लाख योनियोंमें कोई भी शरीर नहीं रहा, तो फिर यह शरीर कैसे रहेगा? जब चौरासी लाख शरीर मैं-मेरे नहीं रहे, तो फिर यह शरीर मैं-मेरा कैसे रहेगा? यह विवेक मनुष्य-शरीरमें हो सकता है, अन्य शरीरोंमें नहीं।
सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें पश्चात्तरकी बात कहकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें बिलकुल साधारण दृष्टिकी बात कहते हैं।
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ २८ ॥
| भारत | = हे भारत! | अव्यक्तनिधनानि | = मरनेके बाद | दीखते हैं। (अतः) |
|---|---|---|---|---|
| भूतानि | = सभी प्राणी | अप्रकट हो जायेंगे, | तत्र | |
| अव्यक्तादीनि | = जन्मसे पहले | व्यक्तमध्यानि, एव | = केवल | परिदेवना |
| अप्रकट थे (और) | बीचमें ही प्रकट | का | = बात ही क्या है? |
व्याख्या—‘अव्यक्तादीनि भूतानि’ —देखने, सुनने और समझनेमें आनेवाले जितने भी प्राणी (शरीर आदि) हैं, वे सब-के-सब जन्मसे पहले अप्रकट थे अर्थात् दीखते नहीं थे।
‘अव्यक्तनिधनान्येव’ —ये सभी प्राणी मरनेके बाद अप्रकट हो जायेंगे अर्थात् इनका नाश होनेपर ये सभी ‘नहीं’ में चले जायेंगे, दीखेंगे नहीं।
‘व्यक्तमध्यानि’ —ये सभी प्राणी बीचमें अर्थात् जन्मके बाद और मृत्युके पहले प्रकट दिखायी देते हैं। जैसे सोनेसे पहले भी स्वप्न नहीं था और जगनेपर भी स्वप्न नहीं रहा,
परिशिष्ट भाव— जो आदि और अन्तमें नहीं है, उसका ‘नहीं’-पना नित्य-निरन्तर है तथा जो आदि और अन्तमें है, उसका ‘है’-पना नित्य-निरन्तर है। जिसका ‘नहीं’-पना नित्य-निरन्तर है, वह ‘असत्’ (शरीर) है और जिसका ‘है’-पना नित्य-निरन्तर है, वह ‘सत्’ (शरीरी) है। असत्के साथ हमारा नित्यवियोग है और सत्के साथ हमारा नित्ययोग है।
ऐसे ही इन प्राणियोंके शरीरोंका पहले भी अभाव था और पीछे भी अभाव रहेगा। परन्तु बीचमें भावरूपसे दीखते हुए भी वास्तवमें इनका प्रतिक्षण अभाव हो रहा है।
‘तत्र का परिदेवना’ —जो आदि और अन्तमें नहीं होता, वह बीचमें भी नहीं होता—यह सिद्धान्त है। सभी प्राणियोंके शरीर पहले नहीं थे और पीछे नहीं रहेंगे; अतः वास्तवमें वे बीचमें भी नहीं हैं। परन्तु यह शरीरी पहले भी था और पीछे भी रहेगा; अतः वह बीचमें भी रहेगा ही। निष्कर्ष यह निकला कि शरीरोंका सदा अभाव है और शरीरीका कभी भी अभाव नहीं है। इसलिये इन दोनोंके लिये शोक नहीं हो सकता।
सम्बन्ध—अब भगवान् शरीरीकी अलौकिकताका वर्णन करते हैं।
१-आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा। (माण्डूक्यकारिका ४। ३१)
२-(क) यत्तु यस्यादिरन्तरञ्च स वै मध्यं च तस्य सन्। (श्रीमद्भा० ११। २४। १७)
‘जिसके आदि और अन्तमें जो है, वही बीचमें भी है और वही सत्य है।’
(ख) आद्यन्तयोरस्य यदेव केवलं कालश्च हेतुश्च तदेव मध्ये ॥ (श्रीमद्भा० ११। २८। १८)
‘इस संसारके आदिमें जो था तथा अन्तमें जो रहेगा, जो इसका मूल कारण और प्रकाशक है, वही परमात्मा बीचमें भी है।’
(ग) न यत् पुरस्तादुत यन् पश्चामध्ये च तन् व्यपदेशमात्रम्। (श्रीमद्भा० ११। २८। २१)
‘जो उत्पत्तिसे पहले नहीं था और प्रलयके बाद भी नहीं रहेगा, ऐसा समझना चाहिये कि बीचमें भी वह है नहीं, केवल कल्पनामात्र, नाममात्र ही है।’