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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1074

श्लोक १० ]

  • साधक-संजीवनी *

१०७३

लिये जिन-जिन पदार्थोंका निषेध है, उस वर्ण-आश्रमके लिये उन-उन पदार्थोंको निषिद्ध माना गया है; जैसे मसूर, गाजर, शलगम आदि।

‘भोजनं तामसप्रियम्’ —ऐसा भोजन तामस मनुष्यको प्रिय लगता है। इससे उसकी निष्ठाकी पहचान हो जाती है।

उपर्युक्त भोजनोंमेंसे सात्त्विक भोजन भी अगर रागपूर्वक खाया जाय, तो वह राजस हो जाता है और लोलुपतावश अधिक खाया जाय, (जिससे अजीर्ण आदि हो जाय) तो वह तामस हो जाता है। ऐसे ही भिक्षुकको विधिसे प्राप्त भिक्षा आदिमें रूखा, सूखा, तीखा और बासी भोजन प्राप्त हो जाय, जो कि राजस-तामस है, पर वह उसको भगवान्के भोग लगाकर भगवन्नाम लेते हुए स्वल्पमात्रामें* खाये, तो वह भोजन भी भाव और त्यागकी दृष्टिसे सात्त्विक हो जाता है।

प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात

चार श्लोकोंके इस प्रकरणमें तीन तरहके—सात्त्विक, राजस और तामस आहारका वर्णन दीखता है; परन्तु वास्तवमें यहाँ आहारका प्रसंग नहीं है, प्रत्युत ‘आहारी’ की रुचिका प्रसंग है। इसलिये यहाँ ‘आहारी’ की रुचिका ही वर्णन हुआ है—इसमें निम्नलिखित युक्तियाँ दी जा सकती हैं—

(१) सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें आये ‘यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः’ पदोंको लेकर अर्जुनने प्रश्न किया कि मनमाने ढंगसे श्रद्धापूर्वक काम करनेवालोंकी निष्ठाकी पहचान कैसे हो? तो भगवान्ने इस अध्यायके दूसरे श्लोकमें श्रद्धाके तीन भेद बताकर तीसरे श्लोकमें ‘सर्वस्य’ पदसे मनुष्यमात्रकी अन्तःकरणके अनुरूप श्रद्धा बतायी और चौथे श्लोकमें पूज्यके अनुसार पूजककी निष्ठाकी पहचान बतायी। सातवें श्लोकमें उसी ‘सर्वस्य’ पदका प्रयोग करके भगवान् यह बताते हैं कि मनुष्यमात्रको अपनी-अपनी रुचिके अनुसार तीन तरहका भोजन प्रिय होता है—‘आहारस्त्वापि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।’ उस प्रियतासे ही मनुष्यकी निष्ठा-(स्थिति-) की पहचान हो जायगी।

‘प्रियः’ शब्द केवल सातवें श्लोकमें ही नहीं आया है, प्रत्युत आठवें श्लोकमें ‘सात्त्विकप्रियाः’ नवें श्लोकमें

‘राजसस्येष्टाः’ और दसवें श्लोकमें ‘तामसप्रियम्’ में भी ‘प्रिय’ और ‘इष्ट’ शब्द आये हैं, जो रुचिके वाचक हैं। यदि यहाँ आहारका ही वर्णन होता तो भगवान् प्रिय और इष्ट शब्दोंका प्रयोग न करके ये सात्त्विक आहार हैं, ये राजस आहार हैं, ये तामस आहार हैं—ऐसे पदोंका प्रयोग करते।

(२) दूसरी प्रबल युक्ति यह है कि सात्त्विक आहारमें पहले ‘आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रतिविधर्नाः’ पदोंसे भोजनका फल बताकर बादमें भोजनके पदार्थोंका वर्णन किया। कारण कि सात्त्विक मनुष्य भोजन करने आदि किसी भी कार्यमें विचारपूर्वक प्रवृत्त होता है, तो उसकी दृष्टि सबसे पहले उसके परिणामपर जाती है।

रागी होनेसे राजस मनुष्यकी दृष्टि सबसे पहले भोजनपर ही जाती है, इसलिये राजस आहारके वर्णनमें पहले भोजनके पदार्थोंका वर्णन करके बादमें ‘दुःखशोकायप्रदाः’ पदसे उसका फल बताया है। तात्पर्य यह कि राजस मनुष्य अगर आरम्भमें ही भोजनके परिणामपर विचार करेगा, तो फिर उसे राजस भोजन करनेमें हितचिन्ताहट होगी; क्योंकि परिणाममें मुझे दुःख, शोक और रोग हो जायें—ऐसा कोई मनुष्य नहीं चाहता। परन्तु राग होनेके कारण राजस पुरुष परिणामपर विचार करता ही नहीं।

सात्त्विक भोजनका फल पहले और राजस भोजनका फल पीछे बताया गया; परन्तु तामस भोजनका फल बताया ही नहीं गया। कारण कि मूढ़ता होनेके कारण तामस मनुष्य भोजन और उसके परिणामपर विचार करता ही नहीं। भोजन न्याययुक्त है या नहीं, उसमें हमारा अधिकार है या नहीं, शास्त्रोंकी आज्ञा है या नहीं और परिणाममें हमारे मन-बुद्धिके बलको बढ़ानेमें हेतु है या नहीं—इन बातोंका कुछ भी विचार न करके तामस मनुष्य पशुकी तरह खानेमें प्रवृत्त होते हैं। तात्पर्य है कि सात्त्विक भोजन करनेवाला तो दैवी-सम्पत्तिवाला होता है और राजस तथा तामस भोजन करनेवाला आसुरी-सम्पत्तिवाला होता है।

(३) यदि भगवान्को यहाँ आहारका ही वर्णन करना होता, तो वे आहारकी विधिका और उसके लिये कर्मोंकी शुद्धि-अशुद्धिका वर्णन करते; जैसे—

शुद्ध कमाईके पैसोंसे अनाज आदि पवित्र खाद्य पदार्थ खरीदे जायें; रसोईमें चौका देकर और स्वच्छ वस्त्र पहनकर

  • स्वल्पमात्रामें खानेका तात्पर्य यह है कि भोजन करनेके बाद पेट याद न आये; क्योंकि पेट दो कारणोंसे याद आता है—अधिक खानेपर और बहुत कम खानेपर।