श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २९ ]
- साधक-संजीवनी *
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करनेवाला कोई एक ही होता है—‘कश्चित्’ और आगे सातवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भी यही बात कही है कि कोई एक मनुष्य ही मेरेको तत्त्वे जानता है—‘कश्चिन्मां वेति तत्त्वतः ।’ इन पदोंसे ऐसा मालूम होता है कि इस अविनाशी तत्त्वको जानना बड़ा कठिन है, दुर्लभ है। परन्तु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है। इस तत्त्वको जानना कठिन नहीं है, दुर्लभ नहीं है, प्रत्युत इस तत्त्वको सच्चे हृदयसे जाननेवालेकी इस तरफ लगनेवालेकी कमी है। यह कमी जाननेकी जिज्ञासा कम होनेके कारण ही है।
‘आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः’—ऐसे ही दूसरा पुरुष इस देहीका आश्चर्यकी तरह वर्णन करता है; क्योंकि यह तत्त्व वाणीका विषय नहीं है। जिससे वाणी भी प्रकाशित होती है, वह वाणी उसका वर्णन कैसे कर सकती है? जो महारूप इस तत्त्वका वर्णन करता है, वह तो शाखा-चन्द्रन्यायकी तरह वाणीसे इसका केवल संकेत ही करता है, जिससे सुननेवालेका इधर लक्ष्य हो जाय। अतः इसका वर्णन आश्चर्यकी तरह ही होता है।
यहाँ जो ‘अन्यः’ पद आया है, उसका तात्पर्य यह नहीं है कि जो जाननेवाला है, उससे यह कहनेवाला अन्य है; क्योंकि जो स्वयं जानेगा ही नहीं, वह वर्णन क्या करेगा? अतः इस पदका तात्पर्य यह है कि जितने जाननेवाले हैं, उनमें वर्णन करनेवाला कोई एक ही होता है। कारण कि सब-के-सब अनुभवी तत्त्वज्ञ महारूप उस तत्त्वका विवेचन करके सुननेवालेको उस तत्त्वतक नहीं पहुँचा सकते। उसकी शंकाओंका, तर्काँका पूरी तरह समाधान करनेकी क्षमता नहीं रखते। अतः वर्णन करनेवालेकी विलक्षण क्षमताका छोटन करनेके लिये ही यह ‘अन्यः’ पद दिया गया है।
‘आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति’—दूसरा कोई इस देहीको आश्चर्यकी तरह सुनता है। तात्पर्य है कि सुननेवाला शास्त्रोंकी, लोक-लोकान्तरोंकी जितनी बातें सुनता आया है, उन सब बातोंसे इस देहीकी बात विलक्षण मालूम देती है। कारण कि दूसरा जो कुछ सुना है, वह सब-का-सब इन्द्रियों, मन, बुद्धि आदिका विषय है; परन्तु यह देही इन्द्रियों आदिका विषय नहीं है, प्रत्युत यह इन्द्रियों आदिके
विषयको प्रकाशित करता है। अतः इस देहीकी विलक्षण बात वह आश्चर्यकी तरह सुनता है।
यहाँ ‘अन्यः’ पद देनेका तात्पर्य है कि जाननेवाला और कहनेवाला—इन दोनोंसे सुननेवाला (तत्त्वका जिज्ञासु) अलग है।
‘श्रुत्वाप्येन वेद न चैव कश्चित्’—इसको सुन करके भी कोई नहीं जानता। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि उसने सुन लिया, तो अब वह जानेगा ही नहीं। इसका तात्पर्य यह है कि केवल सुन करके (सुननेमात्रसे) इसको कोई भी नहीं जान सकता। सुननेके बाद जब वह स्वयं उसमें स्थित होगा, तब वह अपने-आपसे ही अपने-आपको जानेगा*।
यहाँ कोई कहे कि शास्त्रों और गुरुजनोंसे सुनकर ज्ञान तो होता ही है, फिर यहाँ ‘सुन करके भी कोई नहीं जानता’—ऐसा कैसे कहा गया है? इस विषयपर थोड़ी गम्भीरतासे विचार करके देखें कि शास्त्रोंपर श्रद्धा स्वयं शास्त्र नहीं कराते और गुरुजनोंपर श्रद्धा स्वयं गुरुजन नहीं कराते; किन्तु साधक स्वयं ही शास्त्र और गुरुपर श्रद्धा-विश्वास करता है, स्वयं ही उनके सम्मुख होता है। अगर स्वयंके सम्मुख हुए बिना ही ज्ञान हो जाता, तो आजतक भगवान्के बहुत अवतार हुए हैं, बड़े-बड़े जीवन्मुक्त महारूप हुए हैं, उनके सामने कोई अज्ञानी रहना ही नहीं चाहिये था। अर्थात् सबको तत्त्वज्ञान हो जाना चाहिये था! पर ऐसा देखनेमें नहीं आता। श्रद्धा-विश्वासपूर्वक सुननेसे स्वरूपमें स्थित होनेमें सहायता तो जरूर मिलती है, पर स्वरूपमें स्थित स्वयं ही होता है। अतः उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य तत्त्वज्ञानको असम्भव बतानेमें नहीं, प्रत्युत उसे करण-निरपेक्ष बतानेमें है। मनुष्य किसी भी रीतिसे तत्त्वको जाननेका प्रयत्न क्यों न करे, पर अन्तमें अपने-आपसे ही अपने-आपको जानेगा। श्रवण, मनन आदि साधन तत्त्वके ज्ञानमें परम्परागत साधन माने जा सकते हैं, पर वास्तविक बोध करण-निरपेक्ष (अपने-आपसे) ही होता है।
अपने-आपसे अपने-आपको जानना क्या होता है? एक होता है करना, एक होता है देखना और एक होता है जानना। करनेमें कर्मैन्द्रियोंकी, देखनेमें ज्ञानैन्द्रियोंकी और जाननेमें स्वयंकी मुख्यता होती है।
- अपने-आपसे ही अपनेको जाननेकी बात गीतामें कई जगह आयी है; जैसे—
(१) आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते। (२।५५)
(२) यस्मात्परतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः। आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥ (३।१७)
(३) यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यनात्मानं तृष्यति॥ (६।२०)
(४) यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्। (१५।११)