सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1098, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1098

श्लोक २८ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०९७

विश्वास और तत्परता है, वह भी 'सनिष्ठा' कही जाती है। 'कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते' —उन प्रशंसनीय कर्मोंके अलावा कर्मोंके दो तरहके स्वरूप होते हैं—लौकिक (स्वरूपसे ही संसार-सम्बन्धी) और पारमार्थिक (स्वरूपसे ही भगवत्सम्बन्धी):—

(१) वर्ण और आश्रमके अनुसार जीविकाके लिये यज्ञ, अध्यापन, व्यापार, खेती आदि व्यावहारिक कर्तव्य-कर्म और खाना-पीना, उठना-बैठना, चलना-फिरना, सोना-जगना आदि शारीरिक कर्म—ये सभी 'लौकिक' हैं।

(२) जप-ध्यान, पाठ-पूजा, कथा-कीर्तन, श्रवण-मनन, चिन्तन-ध्यान आदि जो कुछ किया जाय, सब 'पारमार्थिक' हैं। इन दोनों प्रकारके कर्मोंको अपने सुख-आराम आदिका उद्देश्य न रखकर निष्कामभाव एवं श्रद्धा-विश्वाससे केवल भगवान्के लिये अर्थात् भगवत्तीर्थ किये जायें तो वे सब-के-सब 'तदर्थीय कर्म' हो जाते हैं। भगवर्द्ध होनेके कारण उनका फल 'सत्' हो जाता है अर्थात् सत्स्वरूप परमात्माके साथ सम्बन्ध होनेसे वे सभी 'दैवी-सम्पत्ति' हो जाते हैं, जो कि मुक्ति देनेवाली है।

जैसे अग्निमें टीकरी रख दी जाय तो अग्नि उसको अग्निरूप बना देती है। यह सब अग्निकी ही विशेषता

परिशिष्ट भाव —पचीसवें श्लोकमें निष्कामभावसे अब यहाँ भगवान्के लिये कर्म करनेकी बात आयी है। 'मोक्षकादुक्षिभिः' (गीता १७।२५) और भक्ति चाहनेवाले भगवान्के लिये कर्म करते हैं (गीता—नवें अध्यायका छब्बीसवाँ, सताईसवाँ, अठ्ठाईसवाँ श्लोक)।

भगवान्का सम्बन्ध होनेसे भी कर्म 'सत्' अर्थात् सत्-फल देनेवाला हो जाता है और असत्के सम्बन्धका त्याग होनेसे भी कर्म 'सत्' हो जाता है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें आया कि परमात्माके उद्देश्यसे किये गये कर्म 'सत्' हो जाते हैं। परन्तु परमात्माके उद्देश्यसे रहित जो कर्म किये जाते हैं, उनकी कौन-सी संज्ञा होगी? इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

अश्रद्धया हृतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ २८ ॥

पार्थ= हे पार्थ!यत्= (और भी) जो कुछइह= यहाँ होता है
अश्रद्धया= अश्रद्धासेकृतम्= किया जाय, (वह सब)= और
हृतम्= किया हुआ हवन,असत्= 'असत्'—= न
दत्तम्= दिया हुआ दान (और)इति= ऐसाप्रेत्य= मरनेके बाद ही होता है अर्थात् उसका
तप्तम्= तपा हुआउच्यते= कहा जाता है।कहीं भी सत्
तपः= तपतत्= उसका (फल)फल नहीं
= तथानो= न तोहोता।