श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २८ ]
- साधक-संजीवनी *
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परिशिष्ट भाव— ‘कृतं च यत्’ पदोंमें नामजप, कीर्तन आदि नहीं आयेगे; क्योंकि उनमें भगवान्का सम्बन्ध होनेसे वे ‘कर्म’ नहीं हैं, प्रत्युत ‘उपासना’ है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार ॐ, तत्, सत्,—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतापनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ‘श्रद्धात्रयविभागयोग’ नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥
इस अध्यायमें श्रद्धाके तीन विभाग किये गये हैं—सात्त्विकी, राजसी और तामसी। इस विभागको जो ठीक-ठीक जान लेगा, वह सात्त्विकी श्रद्धाका ग्रहण और राजसी-तामसी श्रद्धाका त्याग कर देगा। राजसी-तामसी श्रद्धाका त्याग करते ही (सात्त्विकी श्रद्धासे) भगवान्के साथ स्वतःसिद्ध नित्य-सम्बन्धका अनुभव हो जायगा। इसलिये इस अध्यायका नाम ‘श्रद्धात्रयविभागयोग’ रखा गया है।
सत्रहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच
(१) इस अध्यायमें ‘अथ सप्तदशोऽध्यायः’ के तीन, ‘अर्जुन उवाच’ आदि पदोंके चार, श्लोकोंके तीन सौ अड़तीस और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग तीन सौ अड़वावन है।
(२) इस अध्यायमें ‘अथ सप्तदशोऽध्यायः’ के आठ, ‘अर्जुन उवाच’ आदि पदोंके तेरह, श्लोकोंके आठ सौ छियानबे और पुष्पिकाके इक्यावन अक्षर हैं। इस प्रकार
सम्पूर्ण अक्षरोंका योग नौ सौ अड़सठ है। इस अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें दो उवाच हैं—‘अर्जुन उवाच’ और ‘श्रीभगवानुवाच’।
सत्रहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायके अट्ठाईस श्लोकोंमेंसे तीसरे श्लोकके पहले चरणमें ‘मगण’ और तीसरे चरणमें ‘भगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘संकीर्ण-विपुला’; दसवें और बारहवें श्लोकके प्रथम चरणमें तथा पचीसवें-छब्बीसवें श्लोकोंके तृतीय चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘न-विपुला’; सोलहवें-सत्रहवें श्लोकोंके प्रथम चरणमें ‘मगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘म-विपुला’; ग्यारहवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘भगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘भ-विपुला’; और उन्नीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘र-विपुला’ संज्ञावाले छन्द हैं। शेष उन्नीस श्लोक ठीक ‘पथ्यावक्त्र’ अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।