श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1118, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
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परिशिष्ट भाव—यह श्लोक कर्मयोगकी दृष्टिसे कहा गया है। कर्मयोगमें कर्मफलकी इच्छाका त्याग होता है और ज्ञानयोगमें कर्तृत्वाभिमानका त्याग होता है।
‘कर्मफलत्याग’ का तात्पर्य है—कर्मफलकी इच्छाका त्याग। कारण कि कर्मफलका त्याग हो ही नहीं सकता, जैसे—शरीर भी कर्मफल है, फिर उसका त्याग कैसे होगा ? भोजन करनेपर तृप्तिका त्याग कैसे होगा ! खेती करनेपर अन्नका त्याग कैसे होगा ? अतः साधकको कर्मफलकी इच्छाका त्याग करना है। फलेच्छाका त्याग करनेसे साधक सुखी-दुःखी नहीं होगा। इसलिये गीतामें फलेच्छाके त्यागको ही फलका त्याग कहा गया है।
बाहरका त्याग वास्तवमें त्याग नहीं है, प्रत्युत भीतरका त्याग ही त्याग है। अगर कोई बाहरसे त्याग करके एकान्तमें चला जाय तो भी संसारका बीज शरीर तो उसके साथ है ही। मरनेवालेका अपने शरीरसहित सब वस्तुओंका त्याग हो जाता है, पर उससे मुक्ति नहीं होती। अतः हमारी कामना-ममता-आसक्ति ही बाँधनेवाले हैं, संसार नहीं। इसलिये अपने लिये कुछ न करनेसे कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है—‘यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते’ (गीता ४।२३)।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कहा गया कि कर्मफलका त्याग करनेवाला ही वास्तवमें त्यागी है। अगर मनुष्य कर्मफलका त्याग न करे तो क्या होता है—इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्। भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित्॥ १२॥
अत्यागिनाम् = कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको
कर्मणः = कर्मोंका
इष्टम् = इष्ट,
अनिष्टम् = अनिष्ट
च = और
मिश्रम् = मिश्रित—
त्रिविधम् = (ऐसे) तीन प्रकारका
फलम् = फल
प्रेत्य = मरनेके बाद (भी)
भवति = होता है;
तु = परन्तु
सन्न्यासिनाम् = कर्मफलका त्याग करनेवालोंको
क्वचित् = कहीं भी
न = नहीं होता।
व्याख्या—‘अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्’—कर्मका फल तीन तरहका होता है—इष्ट, अनिष्ट और मिश्र। जिस परिस्थितिको मनुष्य चाहता है, वह ‘इष्ट’ कर्मफल है, जिस परिस्थितिको मनुष्य नहीं चाहता, वह ‘अनिष्ट’ कर्मफल है और जिसमें कुछ भाग इष्टका तथा कुछ भाग अनिष्टका है, वह ‘मिश्र’ कर्मफल है। वास्तवमें देखा जाय तो संसारमें प्रायः मिश्रित ही फल होता है; जैसे—धन होनेसे अनुकूल (इष्ट) और प्रतिकूल (अनिष्ट)—दोनों ही स्थितियाँ आती हैं; धनसे निर्वाह होता है—यह अनुकूलता है और टैक्स लगता है, धन नष्ट हो जाता है, छिन जाता है—यह प्रतिकूलता है। तात्पर्य है कि इष्टमें भी आंशिक अनिष्ट और अनिष्टमें भी आंशिक इष्ट रहता ही है। कारण कि सम्पूर्ण संसार त्रिगुणात्मक है (गीता—अठारहवें अध्यायका चालीसवाँ श्लोक); यहाँ जन्म भी दुःखालय (आठवें अध्यायका पन्द्रहवाँ श्लोक) और सुखरहित (नवें अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक) है। अतः चाहे इष्ट (अनुकूल) परिस्थिति हो, चाहे अनिष्ट (प्रतिकूल) परिस्थिति हो, वह सर्वथा अनुकूल या प्रतिकूल होती ही नहीं। यहाँ इष्ट और अनिष्ट कहनेका मतलब यह है कि इष्टमें अनुकूलताकी और अनिष्टमें प्रतिकूलताकी प्रधानता होती है। वास्तवमें कर्मोंका फल मिश्रित ही होता है; क्योंकि कोई भी कर्म सर्वथा निर्दोष नहीं होता (अठारहवें अध्यायका अड़तालीसवाँ श्लोक)।
‘भवत्यत्यागिनां प्रेत्य’—उपर्युक्त सभी फल अत्यागियोंको अर्थात् फलकी इच्छा रखकर कर्म करनेवालोंको ही मिलते हैं, सन्न्यासियोंको नहीं। कारण कि जितने भी कर्म होते हैं, वे सब प्रकृतिके द्वारा अर्थात् प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिके द्वारा ही होते हैं तथा फलरूप परिस्थिति भी प्रकृतिके द्वारा ही बनती है। इसलिये कर्मोंका और उनके फलोंका सम्बन्ध केवल प्रकृतिके साथ है, ‘स्वयं’-(चेतनस्वरूप-) के साथ नहीं। परन्तु जब ‘स्वयं’ उनसे सम्बन्ध तोड़ लेता है, तो फिर वह भोगी नहीं बनता, प्रत्युत त्यागी हो जाता है।
अत्यागीका मतलब है—पीछेके दो (दसवें-ग्यारहवें)