श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 112, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ३१ ]
- साधक-संजीवनी *
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चंचलता तो रहेगी ही नहीं, समाधिमें, स्थिरतामें अथवा निर्विकल्प स्थितिमें भी आसक्ति नहीं रहेगी। इस प्रकार स्थूलशरीरसे होनेवाले कर्ममें, सूक्ष्मशरीरसे होनेवाले चिन्तनमें और कारणशरीरसे होनेवाली स्थिरतामें आसक्तिका नाश हो जानेपर उसका साधन सिद्ध हो जायगा अर्थात् मोह नष्ट हो जायगा और सत्य तत्त्वकी प्राप्ति हो जायगी। इसलिये भगवान्ने अपने उपदेशके आरम्भमें शरीरका सम्बन्ध सर्वथा मिटानेके लिये शरीर-शरीरीके विवेकका वर्णन किया है।
सम्बन्ध—अर्जुनके मनमें कुटुम्बियोंके मरनेका शोक था और गुरुजनोंको मारनेके पापका भय था अर्थात् यहाँ कुटुम्बियोंका वियोग हो जायेगा तो उनके अभावमें दुःख पाना पड़ेगा—यह शोक था और परलोकमें पापके कारण नरका आदिका दुःख भोगना पड़ेगा—यह भय था। अतः भगवान्ने अर्जुनका शोक दूर करनेके लिये ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतकका प्रकरण कहा, और अब अर्जुनका भय दूर करनेके लिये क्षात्रधर्म-विषयक आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्यान्दि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ ३१ ॥
| च | = और | न | विचलित | क्षत्रियस्य | = क्षत्रियके लिये |
|---|---|---|---|---|---|
| स्वधर्मम् | = अपने क्षात्रधर्मको | अर्हसि | = नहीं | अन्यत् | = दूसरा कोई |
| अवेक्ष्य | = देखकर | हि | = होना चाहिये; | श्रेयः | = कल्याणकारक |
| अपि | = भी (तुम्हें) | धर्म्यात् | = क्योंकि | न | = नहीं |
| विकम्पितुम् | = विकम्पित अर्थात् | युद्धात् | = युद्धसे बढ़कर | विद्यते | = है। |
| कर्तव्य-कर्मसे |
व्याख्या—[पहले दो श्लोकोंमें युद्धसे होनेवाले लाभका वर्णन करते हैं।]
‘स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि’—यह स्वयं परमात्माका अंश है। जब यह शरीरके साथ तादात्म्य कर लेता है, तब यह ‘स्व’ को अर्थात् अपने-आपको जो कुछ मानता है, उसका कर्तव्य ‘स्वधर्म’ कहलाता है। जैसे, कोई अपने-आपको ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शुद्र मानता है, तो अपने-अपने वर्णाचित कर्तव्योंका पालन करना उसका स्वधर्म है। कोई अपनेको शिक्षक या नौकर मानता है तो शिक्षक या नौकरके कर्तव्योंका पालन करना उसका स्वधर्म है। कोई अपनेको किसीका पिता या किसीका पुत्र मानता है, तो पुत्र या पिताके प्रति किये जानेवाले कर्तव्योंका पालन करना उसका स्वधर्म है।
यहाँ क्षत्रियके कर्तव्य-कर्मको ‘धर्म’ नामसे कहा गया है*। क्षत्रियका खास कर्तव्य-कर्म है—युद्धसे विमुख न होना। अर्जुन क्षत्रिय है; अतः युद्ध करना उनका स्वधर्म है।
परिशिष्ट भाव—देह-देहीके विवेकका वर्णन करनेके बाद अब भगवान् यहाँसे अङ्गीसवें श्लोकतक देहीके स्वधर्मपालन (कर्तव्यपालन)-का वर्णन करते हैं। कारण कि देह-देहीके विवेकसे जो तत्त्व मिलता है, वही तत्त्व देहके
इसलिये भगवान् कहते हैं कि अगर स्वधर्मको लेकर देखा जाय तो भी क्षात्रधर्मके अनुसार तुम्हारे लिये युद्ध करना ही कर्तव्य है। अपने कर्तव्यसे तुम्हें कभी विमुख नहीं होना चाहिये।
‘धर्म्यान्दि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते’—धर्ममय युद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कोई कल्याण-कारक कर्म नहीं है अर्थात् क्षत्रियके लिये क्षत्रियके कर्तव्यका अनुष्ठान करना ही खास काम है (गीता—अठारहवें अध्यायका तैलालीसवें श्लोक)। [ऐसे ही ब्राह्मण, वैश्य और शुद्रके लिये भी अपने-अपने कर्तव्यका अनुष्ठान करनेके सिवाय दूसरा कोई कल्याणकारी कर्म नहीं है।]
अर्जुनने सातवें श्लोकमें प्रार्थना की थी कि आप मेरे लिये निश्चित श्रेयकी बात कहिये। उसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं कि श्रेय (कल्याण) तो अपने धर्मका पालन करनेसे ही होगा। किसी भी दृष्टिसे अपने धर्मका त्याग कल्याणकारक नहीं है। अतः तुम्हें अपने युद्धरूप धर्मसे विमुख नहीं होना चाहिये।
- अठारहवें अध्यायमें जहाँ (१८।४२—४८ में) चारों वर्णोंके कर्तव्य-कर्मोंका वर्णन आया है, वहाँ बीचमें ‘धर्म’ शब्द भी आया है—‘श्रेयान्स्वधर्मा विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्’ (१८।४७)। इससे ‘कर्म’ और ‘धर्म’ शब्द पर्यायवाची सिद्ध होते हैं।