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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1144

श्लोक २० ] * साधक-संजीवनी * ११४३

सात्त्विक चीजोंका ग्रहण तथा राजस-तामस चीजोंका त्याग करना चाहिये।

'तानि'—इन ज्ञान आदिका तुम्हारे स्वरूपके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। तुम्हारा स्वरूप तो सदा निर्लेप है।

'अपि'—इनके भेदोंको जाननेकी भी बड़ी भारी आवश्यकता है; क्योंकि इनको ठीक तरहसे जाननेपर 'यस्य नाहंकृतो भावो ...... न हन्ति न निबध्यते' (१८।१७)—इस श्लोकका ठीक अनुभव हो जायगा अर्थात् अपने स्वरूपका बोध हो जायगा।

सम्बन्ध—अब भगवान् सात्त्विक ज्ञानका वर्णन करते हैं।

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते। अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥ २०॥

येन = जिस ज्ञानके द्वारा (साधक) विभक्तेषु, सर्वभूतेषु = सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें

अविभक्तम् = विभागरहित एकम् = एक अव्ययम् = अविनाशी भावम् = भाव (सत्ता) को ईक्षते = देखता है,

तत् = उस ज्ञानम् = ज्ञानको (तुम) सात्त्विकम् = सात्त्विक विद्धि = समझो।

व्याख्या—'सर्वभूतेषु येनैकं .......... अविभक्तं विभक्तेषु'—व्यक्ति, वस्तु आदिमें जो 'है' पन दीखता है, वह उन व्यक्ति, वस्तु आदिका नहीं है, प्रत्युत सबमें परिपूर्ण परमात्माका ही है। उन व्यक्ति, वस्तु आदिकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है; क्योंकि उनमें प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है। कोई भी व्यक्ति, वस्तु आदि ऐसी नहीं है, जिसमें परिवर्तन न होता हो; परन्तु अपनी अज्ञता-(बेसमझ-)से उनकी सत्ता दीखती है। जब अज्ञता मिट जाती है, ज्ञान हो जाता है, तब साधककी दृष्टि उस अविनाशी तत्त्वकी तरफ ही जाती है, जिसकी सत्तासे यह सब सत्तावान् हो रहा है।

ज्ञान होनेपर साधककी दृष्टि परिवर्तनशील वस्तुओंको भेदकर परिवर्तनरहित तत्त्वकी ओर ही जाती है (गीता—तेरहवें अध्यायका सत्ताइसवाँ श्लोक)। फिर वह विभक्त अर्थात् अलग-अलग वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना आदिमें विभागरहित एक ही तत्त्वको देखता है (गीता—तेरहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह है कि अलग-अलग वस्तु, व्यक्ति आदिका अलग-अलग ज्ञान और यथायोग्य अलग-अलग व्यवहार होते हुए भी वह इन विकारी वस्तुओंमें उस स्वतःसिद्ध निर्विकार एक तत्त्वको देखता है। उसके देखनेकी यही पहचान है कि उसके अन्तःकरणमें राग-द्वेष नहीं होते।

'तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्'—उस ज्ञानको तू सात्त्विक जान। परिवर्तनशील वस्तुओं, वृत्तियोंके सम्बन्धसे ही इसे 'सात्त्विक ज्ञान' कहते हैं। सम्बन्धरहित होनेपर यही ज्ञान 'वास्तविक बोध' कहलाता है, जिसको भगवान्ने सब साधनोंसे जाननेयोग्य ज्ञेय-तत्त्व बताया है—'ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते' (गीता १३।१२)।

मार्मिक बात

संसारका ज्ञान इन्द्रियोंसे होता है, इन्द्रियोंका ज्ञान बुद्धिसे होता है और बुद्धिका ज्ञान 'मैं'से होता है। वह 'मैं' बुद्धि, इन्द्रियाँ और विषय—इन तीनोंको जानता है। परन्तु उस 'मैं' का भी एक प्रकाशक है, जिसमें 'मैं'का भी भान होता है। वह प्रकाश सर्वदेशीय और असीम है, जबकि 'मैं' एकदेशीय और सीमित है। उस प्रकाशमें जैसे 'मैं'का भान होता है, वैसे ही 'तू', 'यह' और 'वह' का भी भान होता है। वह प्रकाश किसीका भी विषय नहीं है। वास्तवमें वह प्रकाश निर्गुण ही है; परन्तु व्यक्ति-विशेषमें रहनेवाला होनेसे (वृत्तियोंके सम्बन्धसे) उसे 'सात्त्विक ज्ञान' कहते हैं।

इस सात्त्विक ज्ञानको दूसरे ढंगसे इस प्रकार समझना चाहिये—'मैं', 'तू', 'यह' और 'वह'—ये चारों ही किसी प्रकाशमें काम करते हैं। इन चारोंके अन्तर्गत सम्पूर्ण प्राणी आ जाते हैं, जो विभक्त हैं; परन्तु इनका जो प्रकाशक है, वह अविभक्त (विभागरहित) है।

बोलनेवाला 'मैं', उसके सामने सुननेवाला 'तू' और पासवाला 'यह' तथा दूरवाला 'वह' कहा जाता है अर्थात् बोलनेवाला अपनेको 'मैं' कहता है, सामनेवालेको 'तू'