भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्रीमद्भगवद्गीता

च = तथा, महारथा: = महारथीलोग, त्वाम् = तुझे, भयात् = भयके कारण, रणात् = युद्धसे

उपरतम् = हटा हुआ, मंस्यन्ते = मानेंगे।, येषाम् = जिनकी (धारणा में), त्वम् = तू

बहुमत: = बहुमान्य, भूत्वा = हो चुका है, (उनकी दृष्टि में), लाघवम् = (तू) लघुताको, यास्यसि = प्राप्त हो जायगा।

व्याख्या—'भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथा:'—तू ऐसा समझता है कि मैं तो केवल अपना कल्याण करनेके लिये युद्धसे उपरत हुआ हूँ; परन्तु अगर ऐसी ही बात होती और युद्धको तू पाप समझता, तो पहले ही एकान्तमें रहकर भजन-स्मरण करता और तेरी युद्धके लिये प्रवृत्ति भी नहीं होती। परन्तु तू एकान्तमें न रहकर युद्धमें प्रवृत्त हुआ है। अब अगर तू युद्धसे निवृत्त होगा तो बड़े-बड़े महारथीलोग ऐसा ही मानेंगे कि युद्धमें मारे जानेके भयसे ही अर्जुन युद्धसे निवृत्त हुआ है। अगर वह धर्मका विचार करता तो युद्धसे निवृत्त नहीं होता; क्योंकि युद्ध करना क्षत्रियका धर्म है। अतः वह मरनेके भयसे ही युद्धसे निवृत्त हो रहा है।

'येषां च त्वं बहुमत भूत्वा यास्यसि लाघवम्'—भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, शल्य आदि जो बड़े-बड़े महारथी हैं, उनकी दृष्टिमें तू बहुमान्य हो चुका है अर्थात् उनके मनमें यह एक विश्वास है कि युद्ध करनेमें नामी शूरवीर तो अर्जुन ही है। वह युद्धमें अनेक दैत्यों, देवताओं, गन्धर्वों आदिको हरा चुका है। अगर अब तू युद्धसे निवृत्त हो जायगा, तो उन महारथियोंके सामने तू लघुता-(तुच्छता-) को प्राप्त हो जायगा अर्थात् उनकी दृष्टिमें तू गिर जायगा।

अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिता:। निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्॥ ३६॥

तव = तेरे, अहिता: = शत्रुलोग, तव = तेरी, सामर्थ्यम् = सामर्थ्यकी, निन्दन्त: = निन्दा करते

हुए, बहून् = बहुत-से, अवाच्यवादान् = न कहनेयोग्य वचन, च = भी

वदिष्यन्ति = कहेंगे।, तत: = उससे, दुःखतरम् = बढ़कर और दुःखकी बात, नु, किम् = क्या होगी?

व्याख्या—'अवाच्यवादांश्च ..... निन्दन्तस्तव सामर्थ्यम्'—'अहित' नाम शत्रुका है, अहित करनेवालेका है। तेरे जो दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण आदि शत्रु हैं, तेरे वैर न रखनेपर भी वे स्वयं तेरे साथ वैर रखकर तेरा अहित करनेवाले हैं। वे तेरी सामर्थ्यको जानते हैं कि यह बड़ा भारी शूरवीर है। ऐसा जानते हुए भी वे तेरी सामर्थ्यकी निन्दा करेंगे कि यह तो हिजड़ा है। देखो! यह युद्धके मौकेपर हो गया न अलग! क्या यह हमारे सामने टिक सकता है? क्या यह हमारे साथ युद्ध कर सकता है? इस प्रकार तुझे दुःखी करनेके लिये, तेरे भीतर जलन पैदा करनेके लिये न जाने कितने न कहने-लायक वचन कहेंगे। उनके वचनोंको तू कैसे सहेगा?

'ततो दुःखतरं नु किम्'—इससे बढ़कर अत्यन्त भयंकर दुःख क्या होगा? क्योंकि यह देखा जाता है कि जैसे मनुष्य तुच्छ आदमियोंके द्वारा तिरस्कृत होनेपर अपना तिरस्कार सह नहीं सकता और अपनी योग्यतासे, अपनी शूरवीरतासे अधिक काम करके मर मिटता है। ऐसे ही जब शत्रुओंके द्वारा तेरा सर्वथा अनुचित तिरस्कार हो जायगा, तब उसको तू सह नहीं सकेगा और तेजीमें आकर युद्धके लिये कूद पड़ेगा। तेरेसे युद्ध किये बिना रहा नहीं जायगा। अभी तो तू युद्धसे उपरत हो रहा है, पर जब तू समयपर युद्धके लिये कूद पड़ेगा, तब तेरी कितनी निन्दा होगी। उस निन्दाको तू कैसे सह सकेगा?

सम्बन्ध—पीछेके चार श्लोकोंमें युद्ध न करनेसे हानि बताकर अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें युद्ध करनेसे लाभ बताते हैं।

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय:॥ ३७॥