श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
बिलकुल नहीं करने चाहिये, प्रत्युत तत्परतासे अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये। जिसका निष्काम भाव है, जो अपना कल्याण चाहता है, उसको भी तत्परतापूर्वक अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये।
सुख आता हुआ अच्छा लगता है और जाता हुआ बुरा लगता है तथा दुःख आता हुआ बुरा लगता है और जाता हुआ अच्छा लगता है। अतः इनमें कौन अच्छा है, कौन बुरा? अर्थात् दोनों ही समान हैं, बराबर हैं। इस प्रकार सुख-दुःखमें समबुद्धि रखते हुए तुझे अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये।
तेरी किसी भी कर्ममें सुखके लोभसे प्रवृत्ति न हो और दुःखके भयसे निवृत्ति न हो। कर्मोंमें तेरी प्रवृत्ति और निवृत्ति शास्त्रके अनुसार ही हो (गीता—सोलहवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)।
‘नैवं पापमवाप्यसि’—यहाँ ‘पाप’ शब्द पाप और पुण्य—दोनोंका वाचक है, जिसका फल है—स्वर्ग और नरककी प्राप्तिरूप बन्धन, जिससे मनुष्य अपने कल्याणसे वंचित रह जाता है और बार-बार जन्मता-मरता रहता है। भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! समतामें स्थित होकर युद्धरूपी कर्तव्य-कर्म करनेसे तुझे पाप और पुण्य— दोनों ही नहीं बाँधेंगे।
प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात
भगवान्ने इकतीसवें श्लोकसे अड़तीसवें श्लोकतकके आठ श्लोकोंमें कई विचित्र भाव प्रकट किये हैं; जैसे—
(१) किसीको व्याख्यान देना हो और किसी विषयको समझाना हो तो भगवान् इन आठ श्लोकोंमें उसकी कला बताते हैं। जैसे, कर्तव्य-कर्म करना और अकर्तव्य न करना—ऐसे विधि-निषेधका व्याख्यान देना हो तो उसमें पहले विधिका, बीचमें निषेधका और अन्तमें फिर विधिका वर्णन करके व्याख्यान समाप्त करना चाहिये। भगवान्ने भी यहाँ पहले इकतीसवें-बत्तीसवें दो श्लोकोंमें कर्तव्य-कर्म करनेसे लाभका वर्णन किया, फिर बीचमें तैंतीसवेंसे छत्तीसवेंतकके चार श्लोकोंमें कर्तव्य-कर्म न करनेसे हानिका वर्णन किया और अन्तमें सैंतीसवें-अड़तीसवें दो श्लोकोंमें कर्तव्य-कर्म करनेसे लाभका वर्णन करके कर्तव्य-कर्म करनेकी आज्ञा दी।
(२) पहले अध्यायमें अर्जुनने अपनी दृष्टिसे जो दलीलें दी थीं, उनका भगवान्ने इन आठ श्लोकोंमें
समाधान किया है; जैसे अर्जुन कहते हैं—मैं युद्ध करनेमें कल्याण नहीं देखता हूँ (पहले अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक), तो भगवान् कहते हैं—क्षत्रियके लिये धर्ममय युद्धसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणका साधन नहीं है (दूसरे अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)। अर्जुन कहते हैं—युद्ध करके हम सुखी कैसे होंगे? (पहले अध्यायका सैंतीसवाँ श्लोक), तो भगवान् कहते हैं—जिन क्षत्रियोंको ऐसा युद्ध मिल जाता है, वे ही क्षत्रिय सुखी हैं (दूसरे अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक)। अर्जुन कहते हैं—युद्धके परिणाममें नरककी प्राप्ति होगी (पहले अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक), तो भगवान् कहते हैं—युद्ध करनेसे स्वर्गकी प्राप्ति होगी (दूसरे अध्यायका बत्तीसवाँ और सैंतीसवाँ श्लोक)। अर्जुन कहते हैं—युद्ध करनेसे पाप लगेगा (पहले अध्यायका छत्तीसवाँ श्लोक), तो भगवान् कहते हैं—युद्ध न करनेसे पाप लगेगा (दूसरे अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक)। अर्जुन कहते हैं—युद्ध करनेसे परिणाममें धर्मका नाश होगा (पहले अध्यायका चालीसवाँ श्लोक), तो भगवान् कहते हैं—युद्ध न करनेसे धर्मका नाश होगा (दूसरे अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक)।
(३) अर्जुनका यह आग्रह था कि युद्धरूपी घोर कर्मको छोड़कर भिक्षासे निर्वाह करना मेरे लिये श्रेयस्कर है (दूसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक), तो उनको भगवान्ने युद्ध करनेकी आज्ञा दी (दूसरे अध्यायका अड़तीसवाँ श्लोक); और उद्धवजीके मनमें भगवान्के साथ रहनेकी इच्छा थी तो उनको भगवान्ने उत्तराखण्डमें जाकर तप करनेकी आज्ञा दी (श्रीमद्भगवद्गीतास्वरूप स्वरूप, उन्तीसवाँ अध्याय, इकतालीसवाँ श्लोक)। इसका तात्पर्य यह हुआ कि अपने मनका आग्रह छोड़े बिना कल्याण नहीं होता। वह आग्रह चाहे किसी रीतिका हो, पर वह उद्धार नहीं होने देता।
(४) भगवान्ने इस अध्यायके दूसरे-तीसरे श्लोकोंमें जो बातें संक्षेपसे कही थीं, उन्हींको यहाँ विस्तारसे कहा है, जैसे—वहाँ ‘अनार्यजुष्टम्’ कहा तो यहाँ ‘धर्माग्निद्वि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्’ कहा। वहाँ ‘अस्वर्ग्यम्’ कहा तो यहाँ ‘स्वर्गारम्भपावृतम्’ कहा। वहाँ ‘अकर्तारिक्मम्’ कहा, तो यहाँ ‘अकर्तारि चापि भूतानि कथविष्यन्ति तेऽव्यायम्’ कहा। वहाँ युद्धके लिये आज्ञा दी—‘त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप’, तो वही आज्ञा यहाँ देते हैं—‘ततो युद्धाय युयुस्व’।