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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1171

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

सम्बन्ध—बीसवेंसे उततलीसवें श्लोकतक भगवान्ने गुणोंकी मुख्यताको लेकर ज्ञान, कर्म आदिके तीन-तीन भेद बताये। अब इनके सिवाय गुणोंको लेकर सृष्टिकी सम्पूर्ण वस्तुओंके भी तीन-तीन भेद होते हैं—इसका लक्ष्य कराते हुए भगवान् आगेके श्लोकमें प्रकरणका उपसंहार करते हैं।

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।

सत्त्वं प्रकृतिर्जैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥ ४० ॥

पृथिव्याम्= पृथ्वीमेंतत्= वह (ऐसी कोई)प्रकृतिजैः= प्रकृतिसे उत्पन्न
वा= यासत्त्वम्= वस्तुएभिः= इन
दिवि= स्वर्गमें= नहींत्रिभिः= तीनों
वा= अथवाअस्ति= है,गुणैः= गुणोंसे
देवेषु= देवताओंमेंयत्= जोमुक्तम्= रहित
पुनः= तथा इनके सिवायस्यात्= हो।

व्याख्या —[इस अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहा तो भगवान्ने पहले त्याग—कर्मयोगका वर्णन किया। उस प्रकरणका उपसंहार करते हुए भगवान्ने कहा कि जो त्यागी नहीं हैं, उनको अनिष्ट, इष्ट और मिश्र—यह तीन प्रकारका कर्मोंका फल मिलता है और जो संन्यासी हैं, उनको कभी नहीं मिलता। ऐसा कहकर तेरहवें श्लोकसे संन्यास—सांख्ययोगका प्रकरण आरम्भ करके पहले कर्मोंके होनेमें अधिष्ठानादि पाँच हेतु बताये। सोलहवें-सत्रहवें श्लोकोंमें कर्तृत्व माननेवालोंकी निन्दा और कर्तृत्वका त्याग करनेवालोंकी प्रशंसा की। अठारहवें श्लोकमें कर्म-प्रेरणा और कर्म-संग्रहका वर्णन किया। परन्तु जो वास्तविक तत्त्व है, वह न कर्म-प्रेरक है और न कर्म-संग्रहक। कर्म-प्रेरणा और कर्म-संग्रह तो प्रकृतिके गुणोंके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही होते हैं। फिर गुणोंके अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुखके तीन-तीन भेदोंका वर्णन किया। सुखका वर्णन करते हुए यह बताया कि प्रकृतिके साथ यत्किंचित् सम्बन्ध रखते हुए ऊँचा-से-ऊँचा जो सुख होता है, वह सात्त्विक होता है। परंतु जो स्वरूपका वास्तविक सुख है, वह गुणातीत है, विलक्षण है, अलौकिक है (गीता—छठे अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)।

सात्त्विक सुखको 'आत्मबुद्धिप्रसादजम् ' कहकर भगवान्ने उसको जन्म (उत्पन्न होनेवाला) बताया। जन्म वस्तु नित्य नहीं होती। इसलिये उसको जन्म बतानेका तात्पर्य है कि उस जन्म सुखसे भी ऊपर उठना है अर्थात् प्रकृति और प्रकृतिके तीनों गुणोंसे रहित होकर उस परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना है, जो कि सबका अपना

स्वाभाविक स्वरूप है। इसलिये कहते हैं—]

'न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः' —'यहाँ 'पृथिव्याम् ' पदसे मृत्युलोक और पृथ्वीके नीचेके अतल, वितल आदि सभी लोकोंका, 'दिवि ' पदसे स्वर्ग आदि लोकोंका, 'देवेषु ' पदको प्राणिमात्रके उपलक्षणके रूपमें उन-उन स्थानोंमें रहनेवाले मनुष्य, देवता, असुर, राक्षस, नाग, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, वृक्ष आदि सभी चर-अचर प्राणियोंका, और 'वा पुनः ' पदोंसे अनन्त ब्रह्माण्डोंका संकेत किया गया है। तात्पर्य यह हुआ कि त्रिलोक और अनन्त ब्रह्माण्ड तथा उनमें रहनेवाली कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो अर्थात् सब-के-सब त्रिगुणात्मक हैं—'सत्त्वं प्रकृतिर्जैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः '।'

प्रकृति और प्रकृतिका कार्य—यह सब-का-सब ही त्रिगुणात्मक और परिवर्तनशील है। इनसे सम्बन्ध जोड़नेसे ही बन्धन होता है और इनसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेसे ही मुक्ति होती है; क्योंकि स्वरूप असंग है। स्वरूप 'स्व' है और प्रकृति 'पर' है। प्रकृतिसे सम्बन्ध जुड़ते ही अहंकार पैदा हो जाता है, जो कि पराधीनताको पैदा करनेवाला है। यह एक विचित्र बात है कि अहंकारमें स्वाधीनता मालूम देती है, पर है वास्तवमें पराधीनता! कारण कि अहंकारसे प्रकृतिजन्म पदार्थोंमें आसक्ति, कामना आदि पैदा हो जाती है, जिससे पराधीनतामें भी स्वाधीनता दीखने लग जाती है। इसलिये प्रकृतिजन्म गुणोंसे रहित होना आवश्यक है।

प्रकृतिजन्म गुणोंमें रजोगुण और तमोगुणका त्याग करके सत्त्वगुण बढ़ानेकी आवश्यकता है। सत्त्वगुणमें भी प्रसन्नता और विवेक तो आवश्यक है; परन्तु सात्त्विक सुख