श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
‘इमाम्’ कहनेका तात्पर्य है कि अभी इस समबुद्धिको कर्मयोगके विषयमें कहना है कि यह समबुद्धि कर्मयोगमें कैसे प्राप्त होती है ? इसका स्वरूप क्या है ? इसकी महिमा क्या है ? इन बातोंके लिये भगवान्ने इस बुद्धिको योगके विषयमें सुननेके लिये कहा है।
‘बुद्ध्या युक्तो यथा पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि’—अर्जुनके मनमें युद्ध करनेसे पाप लगनेकी सम्भावना थी (पहले अध्यायका छत्तीसवाँ और पैतालीसवाँ श्लोक)। परन्तु भगवान्ने मतमें कर्मोंमें विषमबुद्धि (राग-द्वेष) होनेसे ही पाप लगता है। समबुद्धि होनेसे पाप लगता ही नहीं। जैसे, संसारमें पाप और पुण्यकी अनेक क्रियाएँ होती रहती हैं, पर उनसे हमें पाप-पुण्य नहीं लगते; क्योंकि उनमें हमारी समबुद्धि रहती है अर्थात् उनमें हमारा कोई पक्षपात, आग्रह, राग-द्वेष नहीं रहते। ऐसे ही तू समबुद्धिसे युक्त रहेगा, तो तेरेको भी ये कर्म बन्धनकारक नहीं होंगे। इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें अर्जुनने अपने कल्याणकी बात पूछी थी। इसलिये भगवान् कल्याणके मुख्य-मुख्य साधनोंका वर्णन करते हैं। पहले भगवान्ने सांख्ययोगका साधन बताकर कर्तव्य-कर्म करनेपर बड़ा जोर दिया कि क्षत्रियके लिये धर्मरूप युद्धसे बढकर श्रेयका अन्य कोई साधन नहीं है (दूसरे अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)। फिर कहा कि समबुद्धिसे युद्ध किया जाय तो पाप नहीं लगता (दूसरे अध्यायका अड़तीसवाँ श्लोक)। अब उसी समबुद्धिको कर्मयोगके विषयमें कहते हैं।
कर्मयोगी लोक-संग्रहके लिये सब कर्म करता है—‘लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि’ (गीता—तीसरे
अध्यायका बीसवाँ श्लोक)। लोकसंग्रहके लिये कर्म करनेसे अर्थात् निःस्वार्थभावसे लोक-पर्यादा सुरक्षित रखनेके लिये, लोगोंको उन्मार्गसे हटाकर सन्मार्गमें लगानेके लिये कर्म करनेसे समताकी प्राप्ति सुगमतासे हो जाती है। समताकी प्राप्ति होनेसे कर्मयोगी कर्मबन्धनसे सुगमतापूर्वक छूट जाता है।
यह (उनातालीसवाँ) श्लोक तीसवें श्लोकके बाद ही ठीक बैठता है; और यह वहीं आना चाहिये था। कारण यह है कि इस श्लोकमें दो निष्ठाओंका वर्णन है। पहले ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक सांख्ययोगसे निष्ठा (समता) बतायी और अब कर्मयोगसे निष्ठा (समता) बताते हैं। अतः यहाँ इकतीससे अड़तीसतकके आठ श्लोकोंको देना असंगत मालूम देता है। फिर भी इन आठ श्लोकोंको यहाँ देनेका कारण यह है कि कर्मयोगमें समता कहनेसे पहले कर्तव्य क्या है और अकर्तव्य क्या है ? अर्जुनके लिये युद्ध करना कर्तव्य है और युद्ध न करना अकर्तव्य है—इस विषयका वर्णन होना आवश्यक है। अतः भगवान्ने कर्तव्य-अकर्तव्यका वर्णन करनेके लिये ही उपर्युक्त आठ श्लोक (दूसरे अध्यायके इकतीसवेंसे अड़तीसवेंतक) कहे हैं, और फिर समताकी बात कही है। तात्पर्य है कि पहले ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक सत्-असत्के वर्णनसे समता बतायी कि सत् सत् ही है और असत् असत् ही है। इनमें कोई कुछ भी परिवर्तन नहीं कर सकता। फिर इकतीसवेंसे अड़तीसवें श्लोकतक कर्तव्य-अकर्तव्यकी बात कहकर उनातालीसवें श्लोकसे अकर्तव्यका त्याग और कर्तव्यका पालन करते हुए कर्मोंकी सिद्धि-असिद्धि और फलकी प्राप्ति-अप्राप्तिमें समताका वर्णन करते हैं।
परिशिष्ट भाव—कर्मयोगके दो विभाग हैं—कर्तव्यविज्ञान और योगविज्ञान। भगवान्ने इकतीसवेंसे सैंतीसवें श्लोकतक कर्तव्यविज्ञानकी बात कही है, जिसमें कर्तव्य-कर्म करनेसे लाभ और न करनेसे हानिका वर्णन किया। अब यहाँसे तिरपनवें श्लोकतक योग-विज्ञानकी बात कहते हैं।
पूर्व श्लोकमें भगवान्ने जिस समताकी बात कही है, वह सांख्ययोग और कर्मयोग—दोनों साधनोंसे प्राप्त हो सकती है। शरीर और शरीरीके विभागको जानकर शरीर-विभागसे सम्बन्ध-विच्छेद करना ‘सांख्ययोग’ है तथा कर्तव्य और अकर्तव्यके विभागको जानकर अकर्तव्य-विभागका त्याग और कर्तव्यका पालन करना ‘कर्मयोग’ है। मनुष्यको दोनोंमेंसे किसी भी एक साधनका अनुष्ठान करके इस समताको प्राप्त कर लेना चाहिये। कारण कि समता आनेसे मनुष्य कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
एक धर्मशास्त्र (पूर्वमीमांसा) है और एक मोक्षशास्त्र (उत्तरमीमांसा) है। यहाँ इकतीसवेंसे सैंतीसवें श्लोकतक धर्मशास्त्रकी और उनातालीसवेंसे तिरपनवें श्लोकतक मोक्षशास्त्रकी बात आयी है। धर्मसे लौकिक और पारमार्थिक—दोनों तरहकी उन्नति होती है*। धर्मशास्त्रमें कर्तव्य-पालन मुख्य है। धर्म कहे चाहें कर्तव्य कहे, एक ही बात है।
- ‘यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः’ (वैशेषिक० १।३)