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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1192

श्लोक ४८ ]

  • साधक-संजीवनी *

११११

नहीं होगा। दोषी-भाग सहज नहीं है, स्वभावनियत नहीं है। दोषयुक्त कर्म स्वाभाविक हो सकते हैं, पर स्वभावनियत नहीं हो सकते। एक ब्राह्मणको परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाय तो प्राप्ति होनेके बाद भी वह वैसी ही पवित्रतासे भोजन बनायेगा; जैसी पवित्रतासे ब्राह्मणको रहना चाहिये, वैसी ही पवित्रतासे रहेगा। ऐसे ही एक अन्त्यजको परमात्माकी प्राप्ति हो जाय तो वह जूठन भी खा लेगा; जैसे पहले रहता था, वैसे ही रहेगा। परन्तु ब्राह्मण ऐसा नहीं करेगा; क्योंकि पवित्रतासे भोजन करना उसका स्वभावनियत कर्म है, जबकि अन्त्यजके लिये जूठन खाना दोषी नहीं बताया गया है। इसलिये सिद्ध महापुरुषोंमें एक-एकसे विचित्र कर्म होते हैं, पर वे दोषी नहीं होते। उनका स्वभाव राग-द्वेषसे रहित होनेके कारण शुद्ध होता है।

पहलेके किसी पाप-कर्मसे कसाईके घर जन्म हो गया तो वह जन्म पापका फल भोगनेके लिये हुआ है, पाप करनेके लिये नहीं। पापका फल जाति, आयु और भोग बताया गया है, नया कर्म नहीं बताया गया—‘सति मूले तद्विपाको जाल्यायुर्भोगाः’ (योगदर्शन २।१३)। कर्म करनेमें वह स्वतन्त्र है। यदि उसका चित्त शुद्ध हो जाय तो वह कसाई आदिका कर्म कर नहीं सकेगा। एक सन्तसे किसीने कहा कि अगर कोई अपना धर्म पशुओंको मारना ही मानता है तो वह क्या करे? तो उन सन्तने बड़ी दृढ़तासे कहा कि यदि वह अपने धर्मके अनुसार ही लगातार तीन वर्षतक पवित्रतापूर्वक भगवान्के नामका, अपने इष्टके नामका जप करे, तो फिर वह मार नहीं सकेगा। कारण कि उसका पूर्वजन्मका अथवा यहाँका जो स्वभाव पड़ा हुआ है, वह स्वभाव दोषी है। यदि सच्चे हृदयसे ठीक परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति चाहेगा तो वह कसाईका काम नहीं कर सकेगा। उससे अपने-आप ग्लानि होगी, उपरति

होगी। बिना कहे-सुने उसमें सदगुण स्वाभाविक आयेगें। रामचरितमानसमें शबरीके प्रसंगमें आता है—भगवान् रामने शबरीसे कहा—‘नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥’ (३।३५।४) फिर नौ प्रकारकी भक्ति कहकर अन्तमें भगवान्ने कहा—‘सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें’ (३।३६।४)। तात्पर्य यह है कि भक्ति नौ प्रकारकी होती है, इसका शबरीको पता ही नहीं है; परन्तु शबरीमें सब प्रकारकी भक्ति स्वाभाविक ही थी। सत्संग, भजन, ध्यान आदि करनेसे जिन गुणोंका हमें ज्ञान नहीं है, वे गुण भी आ जाते हैं। जो केवल दूसरोंको सुनानेके लिये याद करते हैं, वे दूसरोंको तो बता देंगे, पर आचरणमें वे गुण तभी आयेगें, जब अपना स्वभाव शुद्ध करके परमात्माकी तरफ चलेगें। इसलिये मनुष्यको अपना स्वभाव और अपने कर्म शुद्ध, निर्मल बनाने चाहिये। इसमें कोई परतन्त्र नहीं है, कोई निर्बल नहीं है, कोई अयोग्य नहीं है, कोई अपात्र नहीं है। मनुष्यके मनमें ऐसा आता है कि मैं कर्तव्यका पालन करनेमें और सदगुणोंको लानेमें असमर्थ हूँ। परन्तु वास्तवमें वह असमर्थ नहीं है। सांसारिक भोगोंकी आदत और पदार्थिक संग्रहकी रुचि होनेसे ही असमर्थताका अनुभव होता है।

उद्धारके योग्य समझकर ही भगवान्ने मनुष्य-शरीर दिया है। इसलिये अपने स्वभावका सुधार करके अपना उद्धार करनेमें प्रत्येक मनुष्य स्वतन्त्र है, सबल है, योग्य है, समर्थ है। स्वभावका सुधार करना असम्भव तो है ही नहीं, कठिन भी नहीं है। मनुष्यको मुक्तिका द्वार कहा गया है—‘साधन धाम मोच्छ कर द्वार’ (मानस ७।४३।४)। यदि स्वभावका सुधार करना असम्भव होता तो इसे मुक्तिका द्वार कैसे कहा जा सकता? अगर मनुष्य अपने स्वभावका सुधार न कर सके, तो फिर मनुष्यजीवनकी सार्थकता क्या हुई?

परिशिष्ट भाव —स्वधर्मरूप कर्मको करनेसे पाप बन तो सकता है, पर लग नहीं सकता—‘कुर्वनान्मोति किल्विषम्’। पाप लगनेमें मुख्य कारण भाव है, क्रिया नहीं। अतः पाप कर्मोंसे नहीं लगता, प्रत्युत स्वार्थ और अभिमान आनेसे लगता है।

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।

सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ४८ ॥

कौन्तेय= हे कुन्तीनन्दन!न, त्यजेत्= त्याग नहीं करनाअग्निः= अग्निकी
सदोषम्= दोषयुक्त होनेपरचाहिये;इव= तरह (किसी-न-
अपि= भीहि= क्योंकिकिसी)
सहजम्= सहजसर्वारम्भाः= सम्पूर्ण कर्मदोषेण= दोषसे
कर्म= कर्मकाधूमेन= धुएँसेआवृताः= युक्त हैं।