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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 1199

११८ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १८

ब्रह्मभूत: = (वह) ब्रह्मरूप बना

हुआ

प्रसन्नात्मा = प्रसन्न मनवाला

साधक

न = न तो (किसीके

लिये)

शोचति = शोक करता है

(और)

न = न (किसीकी)

काङ्क्षति = इच्छा ही करता है।

(ऐसा)

सर्वेषु = सम्पूर्ण

भूतेषु = प्राणियोंमें

सम: = समभाववाला

साधक

पराम्, मद्भक्तिम् = मेरी परभक्तिको

लभते = प्राप्त हो

जाता है।

व्याख्या—'ब्रह्मभूत:'—जब अन्तःकरणमें विनाश- शील

वस्तुओंका महत्त्व मिट जाता है, तब अन्तःकरणकी

अहंकार, घमंड आदि वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं अर्थात्

उनका त्याग हो जाता है। फिर अपने पास जो वस्तुएँ हैं,

उनमें भी ममता नहीं रहती। ममता न रहनेसे सुख और

भोग-बुद्धिसे वस्तुओंका संग्रह नहीं होता। जब सुख और

भोग-बुद्धि मिट जाती है, तब अन्तःकरणमें स्वतः-

स्वाभाविक ही शान्ति आ जाती है।

इस प्रकार साधक जब असत्‌से ऊपर उठ जाता है,

तब वह ब्रह्मप्राप्तिका पात्र बन जाता है। पात्र बननेपर

उसकी ब्रह्मभूत-अवस्था अपने-आप हो जाती है। इसके

लिये उसको कुछ करना नहीं पड़ता। इस अवस्थामें 'मैं

ब्रह्मस्वरूप हूँ और ब्रह्म मेरा स्वरूप है' ऐसा उसको

अपनी दृष्टिसे अनुभव हो जाता है। इसी अवस्थाको यहाँ

(और गीता-पाँचवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें भी)

'ब्रह्मभूत:' पदसे कहा गया है।

'प्रसन्नात्मा'—जब अन्तःकरणमें असत्‌ वस्तुओंका

महत्त्व हो जाता है, तब उन वस्तुओंको प्राप्त करनेकी

कामना पैदा हो जाती है। कामना पैदा होते ही अन्तःकरणकी

शान्ति भंग हो जाती है और अशान्ति (हलचल) पैदा हो

जाती है। परन्तु जब असत्‌ वस्तुओंका महत्त्व मिट जाता

है, तब साधकके चित्तमें स्वाभाविक ही प्रसन्नता रहती है।

अप्रसन्नताका कारण मिट जानेसे फिर कभी अप्रसन्नता

होती ही नहीं। कारण कि सांख्ययोगी साधकके अन्तःकरणमें

अपनेसहित संसारका अभाव और परमात्मतत्त्वका भाव

अटल रहता है।

'न शोचति न काङ्क्षति'—उस प्रसन्नताकी पहचान

यह है कि वह शोक-चिन्ता नहीं करता। सांसारिक कितनी

ही बड़ी हानि हो जाय, तो भी वह शोक नहीं करता और

अमुक परिस्थिति प्राप्त हो जाय-ऐसी इच्छा भी नहीं

करता। तात्पर्य है कि उत्पन्न और नष्ट होनेवाली तथा आने-

जानेवाली परिवर्तनशील परिस्थिति, वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ

आदिके बनने-बिगड़नेसे उसपर कोई असर ही नहीं पड़ता।

जो परमात्मामें अटल रूपसे स्थित है, उसपर आने-

जानेवाली परिस्थितियोंका असर हो ही कैसे सकता है?

'सम: सर्वेषु भूतेषु'—जबतक साधकमें किंचिन्मात्र

भी हर्ष-शोक, राग-द्वेष आदि द्वन्द्व रहते हैं, तबतक वह

सर्वत्र व्याप्त परमात्माके साथ अभिन्नताका अनुभव नहीं

कर सकता। अभिन्नताका अनुभव न होनेसे वह अपनेको

सम्पूर्ण भूतोंमें सम नहीं देख सकता। परन्तु जब साधक

हर्ष-शोकादि द्वन्द्वोंसे सर्वथा रहित हो जाता है, तब

परमात्माके साथ स्वतः-स्वाभाविक अभिन्नता (जो कि

सदासे ही थी)-का अनुभव हो जाता है। परमात्माके साथ

अभिन्नता होनेसे, अपना कोई व्यक्तित्व* न रहनेसे अर्थात्

'मैं हूँ' इस रूपसे अपनी कोई अलग सत्ता न रहनेसे वह

सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम हो जाता है। जैसे परमात्मा सम्पूर्ण

प्राणियोंमें सम है-'समोऽहं सर्वभूतेषु' (गीता-नवें

अध्यायका उनतीसवाँ श्लोक), ऐसे ही वह भी सम्पूर्ण

प्राणियोंमें सम हो जाता है।

वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम किस प्रकार होता है?

जैसे-मनोराज्य और स्वप्नमें जो नाना सृष्टि होती है,

उसमें मन ही अनेक रूप धारण करता है अर्थात् वह सृष्टि

मनोमय होती है। मनोमय होनेसे जैसे सब सृष्टिमें मन

है और मनमें सब सृष्टि है, ऐसे ही सब प्राणियोंमें

(आत्मरूपसे) वह है और उसमें सम्पूर्ण प्राणी हैं (गीता-

छठे अध्यायका उनतीसवाँ श्लोक)। इसको यहाँ 'सम:

सर्वेषु भूतेषु' कहा है।

'मद्भक्तिं लभते पराम्'—जब समरूप परमात्माके

साथ अभिन्नताका अनुभव होनेसे साधकका सर्वत्र समभाव

हो जाता है, तब उसका परमात्मामें प्रतिक्षण वर्धमान एक

विलक्षण आकर्षण, खिंचाव, अनुराग हो जाता है। उसीको

यहाँ पराभक्ति कहा है।

  • व्यक्तित्व उसे कहते हैं, जिसमें मनुष्य अपनी सत्ता अलग मानता है और जिससे बन्धन होता है।