श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
स्वर्यका सम्बन्ध जुड़ जाता है, तब 'मैं हूँ' यह अहंभाव शुभ-अशुभ कर्मोंका कारण बन जाता है, जिससे जन्म-मरणका चक्कर चल पड़ता है। परन्तु जो ऊँचे दर्जोंका साधक होता है अर्थात् जिसकी निरन्तर ब्रह्मभूत-अवस्था रहती है, उसके सात्त्विक ज्ञान (इसी अध्यायका बीसवाँ श्लोक)-में सब जगह ही अपने स्वरूपका बोध रहता है। परन्तु जबतक साधकका सत्त्वगुणके साथ सम्बन्ध रहता है, तबतक नींदसे जगनेपर तत्काल 'मैं ब्रह्म हूँ' अथवा 'सब कुछ एक परमात्मा ही है'—ऐसी वृत्ति पकड़ी जाती है और मालूम होता है कि नींदमें यह वृत्ति छूट गयी थी, मानो उसकी भूल हो गयी थी और अब पीछे उस तत्त्वकी जागृति हो गयी है, स्मृति आ गयी है।
परिशिष्ट भाव— 'मैं जितना हूँ और जो हूँ, (यावान् यश्चास्मि)—यह बात सगुणकी ही है; क्योंकि 'यावान्-तावान्' निर्गुणमें हो सकता ही नहीं, प्रत्युत सगुणमें ही हो सकता है। चतुःश्लोकी भागवतमें भी भगवान्ने 'यावान्' पदका प्रयोग करते हुए ब्रह्माजीसे कहा है—
यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः। तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात्॥
(श्रीमद्भा० २।१।३१)
'मैं जितना हूँ, जिस भाववाला हूँ, जिन रूप, गुण और कर्मोंवाला हूँ, उस मेरे (समग्ररूपके) तत्त्वका यथार्थ अनुभव तुम्हें मेरी कृपासे ज्यों-का-त्यों हो जाय।'
'यावान् यश्चास्मि' का वर्णन भगवान्ने सातवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें 'साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः' पदोंमें किया था। इससे सगुणकी विशेषता तथा मुख्यता सिद्ध होती है।
ज्ञानमार्गसे चलनेवालेको जब (ज्ञानोत्तरकालमें) भक्ति प्राप्त होती है तब उसमें तत्त्वसे जानना (ज्ञात्वा) और प्रविष्ट होना (विशते)—ये दो ही होते हैं, दर्शन नहीं होते। उनमें कोई कमी तो नहीं रहती, पर दर्शनकी इच्छा उनमें नहीं होती। परन्तु आरम्भसे ही भक्तिमार्गसे चलनेवालेको तत्त्वसे जानने (ज्ञातुम्) और प्रविष्ट होने (प्रवेष्टुम्)-के सिवाय भगवान्के दर्शन (द्रष्टुम्) भी होते हैं (गीता—ग्यारहवें अध्यायका चौवनवाँ श्लोक)। इसलिये ज्ञानमार्गी सन्तोंमें भगवत्प्रेम (भक्ति)-की बात तो आती है, पर दर्शनकी बात नहीं आती।
जैसे विभिन्न मार्गोंसे आनेवाले व्यक्ति दरवाजेंमें प्रविष्ट होनेपर एक साथ मिल जाते हैं, ऐसे ही विभिन्न योग-मार्गोंपर चलनेवाले साधक भगवान्में प्रविष्ट होनेपर (विशते) एक हो जाते हैं अर्थात् अहम्की सूक्ष्म गन्ध भी न रहनेसे उनमें कोई मतभेद नहीं रहता।
प्रेमकी दो अवस्थाएँ होती हैं—(१) कभी भक्त प्रेममें डूब जाता है, तब प्रेमी और प्रेमास्पद दो नहीं रहते, एक हो जाते हैं और (२) कभी भक्तमें प्रेमका उछाल आता है, तब प्रेमी और प्रेमास्पद एक होते हुए भी लीलाके लिये दो हो जाते हैं। यहाँ पहली अवस्थाको बतानेके लिये 'विशते' पद आया है।
सम्बन्ध— पहले श्लोकमें अर्जुनने सन्यास और त्यागके तत्त्वके विषयमें पूछा तो उसके उत्तरमें भगवान्ने चौथेसे बारहवें श्लोकतक कर्मयोगका और इकतालिसवेंसे अड़तालिसवें श्लोकतक कर्मयोगका तथा संक्षेपमें भक्तियोगका वर्णन किया; और तेरहवेंसे चालीसवें श्लोकतक विचारप्रधान सांख्ययोगका तथा उनचासवेंसे पचपनवें श्लोकतक ध्यान-प्रधान सांख्ययोगका एवं संक्षेपमें पराभक्तिकी प्राप्तिका वर्णन किया। अब भगवान् शरणागतिकी प्रधानतावाले भक्तियोगका वर्णन आरम्भ करते हैं।
सर्वकर्माण्यपि सदा कूर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥ ५६ ॥