भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक ४० ]

  • साधक-संजीवनी *

१२१

विधि आदिकी कोई जूटि हो जाय तो उसका उलटा फल हो जाता है*। परन्तु जितनी समता अनुष्ठानमें, जीवनमें आ गयी है, उसमें अगर व्यवहार आदिकी कोई भूल हो जाय, सावधानीमें कोई कमी रह जाय तो उसका उलटा फल (बन्धन) नहीं होता। जैसे, कोई हमारे यहाँ नौकरी करता हो और अँधेरेमें लालटेन जलाते समय कभी उसके हाथसे लालटेन गिरकर टूट जाय तो हम उसपर नाराज होते हैं। परन्तु उस समय जो हमारा मित्र हो, जो हमारेसे कभी कुछ चाहता नहीं, उसके हाथसे लालटेन गिरकर टूट जाय तो हम उसपर नाराज नहीं होते, प्रत्युत कहते हैं कि हमारे हाथसे भी तो वस्तु टूट जाती है, तुम्हारे हाथसे टूट गयी तो क्या हुआ ? कोई बात नहीं। अतः जो सकामभावसे कर्म करता है, उसके कर्मका तो उलटा फल हो सकता है, पर जो किसी प्रकारका फल चाहता ही नहीं, उसके अनुष्ठानका उलटा फल कैसे हो सकता है ? नहीं हो सकता।

(४) समताका थोड़ा-सा भी अनुष्ठान हो जाय, थोड़ा-सा भी समताका भाव बन जाय तो वह जन्म-मरणरूप महान् भयसे रक्षा कर लेता है अर्थात् कल्याण कर देता है। जैसे सकाम कर्म फल देकर नष्ट हो जाता है, ऐसे यह थोड़ी-सी भी समता फल देकर नष्ट नहीं होती, प्रत्युत इसका उपयोग केवल कल्याणमें ही होता है। यज्ञ, दान, तप आदि शुभ कर्म यदि सकामभावसे किये जायें तो उनका नाशवान् फल (धन-सम्पत्ति एवं स्वर्गादिकी प्राप्ति) होता है और यदि निष्कामभावसे किये जायें तो उनका अविनाशी फल (मोक्ष) होता है। इस प्रकार यज्ञ, दान, तप आदि शुभ कर्मोंके तो दो-दो फल हो सकते हैं, पर समताका एक ही फल—कल्याण होता है। जैसे कोई मुसाफिर चलते-चलते रास्तेमें रुक जाय अथवा सो जाय तो वह जहाँसे चला था, वहाँ पुनः लौटकर नहीं चला जाता, प्रत्युत जहाँतक वह पहुँच गया, वहाँतकका रास्ता तो कट ही गया। ऐसे ही जितनी समता जीवनमें आ गयी, उसका नाश कभी नहीं होता।

‘स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्’—निष्कामभाव थोड़ा होते हुए भी सत्य है और भय महान् होते हुए भी असत्य है। जैसे मनभर रूई हो तो उसको जलानेके लिये मनभर अग्निकी जरूरत नहीं है। रूई एक मन हो या सौ मन, उसको जलानेके लिये एक दियासलाई पर्याप्त है। एक दियासलाई लगाते ही वह रूई खुद दियासलाई अर्थात् अग्नि बन जायगी। रूई खुद दियासलाईकी मदद करेगी। अग्नि रूईके साथ नहीं होगी, प्रत्युत रूई खुद ज्वलनशील होनेके कारण अग्निके साथ हो जायगी। इसी तरह असंगता आग है और संसार रूई है। संसारसे असंग होते ही संसार अपने-आप नष्ट हो जायगा; क्योंकि मूलमें संसारकी सत्ता न होनेसे उससे कभी संग हुआ ही नहीं।

थोड़े-से-थोड़ा त्याग भी सत् है और बड़ी-से-बड़ी क्रिया भी असत् है। क्रियाका तो अन्त होता है, पर त्याग अनन्त होता है। इसलिये यज्ञ, दान, तप आदि क्रियाएँ तो फल देकर नष्ट हो जाती हैं (गीता—आठवें अध्यायका अट्टाईसवाँ श्लोक), पर त्याग कभी नष्ट नहीं होता—‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ (गीता १२।१२)। एक अहम्के त्यागसे अनन्त सृष्टिका त्याग हो जाता है; क्योंकि अहमने ही सम्पूर्ण जगत्को धारण कर रखा है (गीता—सातवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)।

जैसे, कितनी ही घास हो, क्या अग्निके सामने टिक सकती है? कितना ही अँधेरा हो, क्या प्रकाशके सामने टिक सकता है? अँधेरे और प्रकाशमें लड़ाई हो जाय तो क्या अँधेरा जीत जायगा? ऐसे ही अज्ञान और ज्ञानकी लड़ाई हो जाय तो क्या अज्ञान जीत जायगा? महान्-से-महान् भय क्या अभयके सामने टिक सकता है? समता

  • ऐसी कथा आती है कि त्वष्टा ने इन्द्रका वध करनेवाले पुत्रकी इच्छासे एक यज्ञ किया। उस यज्ञमें ऋषियोंने ‘इन्द्रशत्रुं विवर्धस्व’ इस मन्त्रके साथ हवन किया। ‘इन्द्रशत्रु’ शब्दमें यदि षष्ठीतत्पुरुष समास हो तो इसका अर्थ होगा—इन्द्रस्य शत्रुः (इन्द्रका शत्रु) और यदि बहुव्रीहि समास हो तो इसका अर्थ होगा—‘इन्द्रः शत्रुर्वस्य’ (जिसका शत्रु इन्द्र है)। समासमें भेद होनेसे स्वरमें भी भेद हो जाता है। अतः षष्ठीतत्पुरुष समासवाले ‘इन्द्रशत्रु’ शब्दका उच्चारण अन्त्योदात्त होगा अर्थात् अन्तिम अक्षर ‘त्रु’ का उच्चारण उदात्त स्वरसे होगा; और बहुव्रीहि समासवाले ‘इन्द्रशत्रु’ शब्दका उच्चारण आद्योदात्त होगा अर्थात् प्रथम अक्षर ‘इ’ का उच्चारण उदात्त स्वरसे होगा। ऋषियोंका उद्देश्य तो षष्ठीतत्पुरुष समासवाले ‘इन्द्रशत्रु’ शब्दका अन्त्योदात्त उच्चारण करना था, पर उन्होंने उसका आद्योदात्त उच्चारण कर दिया। इस प्रकार स्वरभेद हो जानेसे मन्त्रोच्चारणका फल उलटा हो गया, जिससे इन्द्र ही त्वष्टाके पुत्र (वृत्रासुर)-का वध करनेवाला हो गया। इसलिये कहा गया है—

मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह। स वाग्ब्रजो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात्॥

(पाणिनीयशिक्षा)