भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक ४६-४७ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२७

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।

तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विज्ञानतः ॥ ४६ ॥

सर्वतः= सब तरफसेअर्थः= प्रयोजन (रहता है) अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता,ब्राह्मणस्य= ब्रह्मज्ञानीका
सम्प्लुतोदके= परिपूर्ण महान् जलाशयके (प्राप्त होनेपर)विज्ञानतः= (वेदों और शास्त्रोंको) तत्त्वसे जाननेवालेसर्वेषु= सम्पूर्ण
उदपाने= छोटे गड्ढोंमें भरे जलमें (मनुष्यका)वेदेषु= वेदोंमें
यावान्= जितनातावान्= उतना (ही प्रयोजन रहता है) अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता।

व्याख्या—‘यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके’— जलसे सर्वथा परिपूर्ण, स्वच्छ, निर्मल महान् सरोवरके प्राप्त होनेपर मनुष्यको छोटे-छोटे जलाशयोंकी कुछ भी आवश्यकता नहीं रहती। कारण कि छोटे-से जलाशयमें अगर हाथ-पैर धोये जायँ तो उसमें मिट्टी घुल जानेसे वह जल स्नानके लायक नहीं रहता; और अगर उसमें स्नान किया जाय तो वह जल कपड़े धोनेके लायक नहीं रहता और यदि उसमें कपड़े धोये जायँ तो वह जल पीनेके लायक नहीं रहता। परन्तु महान् सरोवरके मिलनेपर उसमें सब कुछ करनेपर भी उसमें कुछ भी फर्क नहीं पड़ता अर्थात् उसकी स्वच्छता, निर्मलता, पवित्रता वैसी-की-वैसी ही बनी रहती है।

‘तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विज्ञानतः’— ऐसे ही जो महापुरुष परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो गये हैं, उनके लिये वेदोंमें कहे हुए यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत आदि जितने भी पुण्यकारी कार्य हैं, उन सबसे उनका कोई मतलब नहीं

परिशिष्ट भाव— सांसारिक भोगोंका अन्त नहीं है। अन्त ब्रह्माण्ड हैं और उनमें अन्त तरहके भोग हैं। परन्तु उनका त्याग कर दें, उनसे असंग हो जायँ तो उनका अन्त आ जाता है। ऐसे ही कामनाएँ भी अन्त होती हैं। परन्तु उनका त्याग कर दें, निष्काम हो जायँ तो उनका अन्त आ जाता है।

सम्बन्ध— भगवान्ने उन्तालीसवें श्लोकमें जिस समबुद्धि-(समता-) को सुननेके लिये अर्जुनको आज्ञा दी थी, अब आगेके श्लोकमें उसकी प्राप्तिके लिये कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥

कर्मणि= कर्तव्य-कर्म करनेमेंकदाचन= कभीते= तेरी
एव= हीमा= नहीं (अतः तू)अकर्मणि= कर्म न करनेमें (भी)
ते= तेराकर्मफलहेतुः= कर्मफलका हेतु (भी)सङ्गः= आसक्ति
अधिकारः= अधिकार है,मा= मतमा= न
फलेषु= फलोंमेंभूः= बन (और)अस्तु= हो।