श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसाधक-संजीवनीमें आयी
गीता-सम्बन्धी मुख्य बातें
१. गीतामें भक्तिकी विशेषता—न. नि.; १८। ५५ वि.
२. गीतामें आये विलक्षण श्लोक—न.नि.
३. गीताका बिना पुस्तक उलटा पाठ करनेसे शान्ति—प्रा.
४. गीतामें करणसापेक्ष शैलीवाले श्लोक—प्रा.
५. गीतामें ज्ञानयोगसे परमात्मप्राप्ति होनेकी बात—२। १५
६. गीतामें 'तस्मात्' पदका प्रयोग—२। १८ टि.
७. गीतामें कर्मयोगसे परमात्मप्राप्ति होनेकी बात—२। ७१
८. गीतामें भगवान्के अज, अव्यय और ईश्वर—इन तीनों
रूपोंको जानने और न जाननेकी बात—४। ६ टि.
९. गीतामें मुख्य निवृत्तिपरक श्लोक—४। २१
१०. गीतामें कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोगका मुख्य
श्लोक—४। २३
११. गीतामें कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोगसे सम्पूर्ण
पापोंका नाश बतानेवाले श्लोक—४। २३ परि.;
७। १९; १६। ५
१२. गीतामें कर्मयोगके द्वारा स्वतन्त्रतापूर्वक परमात्मप्राप्ति
बतानेवाले श्लोक—५। ५ परि.
१३. गीतामें सभी साधनोंकी कसौटी बतानेवाला श्लोक—
६। २२
१४. गीतामें ध्यानयोगसे परमात्मप्राप्ति होनेकी बात—६। २८
१५. गीतामें 'महात्मा' शब्दका प्रयोग—७। १९ परि., टि.;
८। १५
१६. गीतामें केवल भक्तके लिये प्रयुक्त शब्द—७। १९
परि., टि.
१७. गीतामें सगुण-निराकार, निर्गुण-निराकार और सगुण-
साकारकी उपासनाका वर्णन—७। ३० टि.
१८. गीतामें परमात्माके विषयमें आये भिन्न-भिन्न वचनोंका
तात्पर्य—८। ४ वि.
१९. गीताके एक ही श्लोकमें सबसे अधिक (पाँच)
सम्बोधन—१०। १५
२०. गीतामें एक निश्चयकी महिमा—१०। ३६
२१. गीतामें आयी कुल विभूतियोंकी गणना—
१०। ४० परि.
२२. गीतामें 'माम्' पदका प्रयोग—१०। ४० परि.
२३. गीतामें भगवान्द्वारा कथित सबसे लम्बा (तिहत्तर
श्लोकोंका) प्रकरण—१२। २ से १४। २० तक
२४. गीतामें कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोगमें निर्मम-
निरहंकार होनेकी बात—२। ७१; ७। ५; १२। १३
और १८। ५३
२५. गीतामें एक ही परमात्मा तीन प्रकारसे वर्णन—
१३। १२ परि.
२६. गीतामें विभूति-वर्णन—१५। १५ वि.
२७. गीतामें क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम (प्रकृति, जीव
और परमात्मा)—का एक साथ वर्णन—१५। १६ टि.
२८. गीतामें क्षर (जगत्), अक्षर (जीव) और पुरुषोत्तम
(परमात्मा)—का तीनों लिंगोंमें वर्णन—१५। १६ टि.;
७। १९ परि.
२९. गीतामें दैवी-सम्पत्तिका वर्णन—१६। ६
३०. गीतामें 'सत्त्व-रज-तम' के वर्णनमें व्यतिक्रम—
१८। ७-९
३१. गीतामें कई रीतियोंसे प्रकृतिद्वारा होनेवाली क्रियाओंका
वर्णन—१८। १४ टि.
३२. गीतामें तीनों योगोंमें भगवत्प्रेम—१८। १५ वि.
३३. गीतामें भगवान् श्रीकृष्णका ईश्वरत्व—१८। ६२
३४. गीतामें आये भक्तिपरक श्लोक—१८। ६३ टि.
३५. गीताके तीसरे अध्यायमें कर्तव्य-पालनकी आवश्यकता
बतानेवाले श्लोक—१८। ६६ टि.
३६. गीतामें अनन्यभक्तिकी महिमा—१८। ६६
३७. गीतामें भगवान्के लिये तीन बार 'अच्युत' सम्बोधन
देनेका अभिप्राय—१८। ७३