श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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साधक-संजीवनी-कोश
| नास्ति तेषु जातिविद्या..... | १८। ६६ |
|---|---|
| नास्त्यकृतः कृतेन..... | १५। १५ |
| नास्याब्रह्मवित् कुले..... | ६। ४२ |
| नित्यदा ह्यंग भूतानि..... | २। १६ |
| निरपेक्षं मुनिं शान्तम्..... | १२। १६ |
| निरीक्ष्य तावुत्तमपूरुषो..... | ४। ६ |
| निवृत्तिरपि मूढस्य..... | ४। १९ |
| नीचवत् सेवेत सदगुरुम्..... | ४। ३४ |
| नुदेहमाद्यं सुलभम्..... | ७। १९ |
| नेत्रवेदखयुग्मे हि..... | १८। ७८ |
| नेह नानास्ति किंचन..... | ७। ३० |
| नैव वाचा न मनसा..... | १५। ११ |
| नोद्यं वा परिहारो वा..... | ७। ८ |
प
| पंचं चैव महावीर्याः..... | १। ४६ |
|---|---|
| पंचांगयुक्तपंचदशच्छदाद्या..... | ९। २० |
| परिणामतापसंस्कार..... | ५। २२ |
| परित्राणाय साधूनां सेवाम्..... | ८। १५ |
| परित्राणां पवित्रं यः..... | ४। १०, ३८; |
| १०। ११-१२; १२। १६ | |
| पशुबुद्धिमिमां जहि..... | १३। २८ |
| पशूनां रक्षणम्..... | १८। ४६ |
| पाठक्रमार्थक्रमो बलीयान्..... | ६। ११ |
| पारमार्थिकमद्वैतं द्वैतम्..... | १८। ५७ |
| पाषण्डिनो विकर्मस्थान्..... | १८। ४४ |
| पाहि पाहि महायोगिन्..... | ७। १६ |
| पितामहवचः श्रुत्वा..... | ४। ९ |
| पितृगोत्री यथा कन्या..... | १८। ६६ |
| पित्रोः सम्पश्यतोः..... | ४। ९ |
| पिवन्त इव चक्षुर्भ्याम्..... | ४। ६ |
| पुस्तवे स्त्रीत्वे विशेषे..... | १८। ६६ |
| पुरा शक्रेण मे दत्तम्..... | ११। ३५ |
| पुरोधसां वसिष्ठोऽहम्..... | १०। ३९ |
| पुरुषान् परं किंचित्सा..... | ७। ७ |
| पूर्वेषामपि गुरु..... | ११। ३७; १५। १२; १७। ३ |
| पृथिव्यां तिष्ठन् यो..... | १५। १२ |
| प्रकाशक्रियास्थितिशीलम्..... | १४। ७; १८। २८ |
| प्रकाशं वा प्रकाशं वा..... | १। १० |
| प्रजानां रक्षणम्..... | १८। ४६ |
| प्रजानामेव भूतर्थं स..... | ४। २ |
| प्रतिकूलवेदीन्यं दुःखम्..... | ६। ७ |
| प्रयतिष्ये तथा कर्तुम्..... | १। ४ |
| प्राप्तव्यमर्थं लभते..... | १८। १२ |
| प्रियवाक्यप्रदानेन..... | १७। १५ |
ब
| बहवो मत्पदं प्राप्ताः..... | १८। ६६ |
|---|---|
| बहु स्यां प्रजायेय..... | ७। १०; १। ५, ७, ८, २४; |
| १०। २०; १४। ७ | |
| बाध्यमानोऽपि मद्भक्तो..... | ९। ३१ |
| ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति..... | ५। २० |
| ब्रह्मणा सह ते सर्वे..... | ८। २४ |
| ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति..... | ५। २०, २४; ९। ३२ |
| ब्राह्मणस्य हि देहोऽयम्..... | १८। ४४ |
| ब्रूयुः स्निग्धस्य..... | १०। १ |
भ
| भक्तभक्तिमान्..... | ४। ८ |
|---|---|
| भक्त्यर्थं कल्पितम्..... | ७। १८ |
| भक्त्या सजातया भक्त्या..... | ७। ३०; १२। २ |
| भजिता क्वथिता धाना..... | १६। ५ |
| भावग्राही जनार्दनः..... | ९। ३० |
| भगवानपि ता राज्ञीः..... | ४। ६ |
| भावाद्वैतं सदा कुर्यात्..... | ५। १८ |
| भुज् पालनाभ्यवहारयोः..... | ३। १२ |
| भृद्गीपवर्षसरिदद्दिनभः..... | ७। ३० |
| भूमनिन्द्राप्रशंसासु..... | १२। ५ |
| भृत्यापराधे सर्वत्र..... | १८। ६६ |
| भोगा न भुक्ता वयमेव..... | १५। ९ |
| भोगे रोगभयं कुले..... | १६। १ |
म
| मत्सेवार्थां तु निर्गुणा..... | १४। २६ |
|---|---|
| मन एव मनुष्याणाम्..... | ६। ३४ |
| मनसा वचसा दृष्ट्या..... | ७। १२, १९, ३० |
| मनस्येकं वचस्येकम्..... | १६। १ |
| मनस्वी कार्यार्थी..... | ३। ८; १६। ३ |
| मन्त्रो हीनः स्वरतो..... | २। ४० |
| मन्त्रिकेतं तु निर्गुणम्..... | १४। २६ |
| ममतामेध्यद्वीपितः..... | ४। १० |
| मयानुकूलेन नभस्वतेरितम्..... | ७। २६ |
| मया परोक्षं भजता..... | ६। ४० |
| मरीचिरगिराश्चात्रिः..... | १०। ६ |
| मल्लानामशनिर्नुणां नरवरः..... | ७। २५ |
| महत्संगस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च..... | ६। ४२ |
| महापातकयुक्ता वा..... | ८। ५ |
| मा कश्चिद् दुःखभागभवेत्..... | ३। ३४ |
| मात्रा स्वस्वा दुहित्रा..... | २। ६० |
| मागांस्त्रयो मया प्रोक्ताः..... | प्रा. |
| मागांस्त्रयो मे विख्याता..... | प्रा. |
| मागंप्रयाते मणिलाभवन्मे..... | ११। ५२ |