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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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संदर्भ में पढ़ें
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  • पारिभाषिक शब्दावली *

१२९३

राधा (श्रीजी)—४।६;६।३१;९।३४

राम—३।२६,३४;४।६,९,११;

७।२२;२०।४-५,३१;

१८।४६ परि.,६६ वि.

रावण—१।१९;१६।१

रुक्मिणी—४।६

लक्ष्मण—५।१८ वि.;१८।७०

लक्ष्मी—१८।६६ वि.

वरुण—१०।२९;११।३९

वसिष्ठ—१०।४१

वामन—१०।२१

वाराह—६।११

वाल्मीकि—९।३०

वासुकि—१०।२८

विदुर—९।३२

विदुरानी—४।११ परि.;९।२६

विभीषण—७।२२;११।५४;

१८।६६ वि.

विश्वामित्र—४।११

विश्वेदेव—११।२२

विष्णु—७।३०;१०।२१;११।१५,

१७,४६,५१-५२;१३।१६

वृन्दावन—११।४९ परि.

वेदव्यास—१।१ अव.;१०।१२-१३,

३७;११।९ परि.;१८।४४,७५

शंकर—१०।२३,२५;११।१५;१३।१६

शंकराचार्य—२।४८

शक्टासुर—४।६

शकुन्तला—१२।१४

शतरूपा—५।१२;१२।८

शबरी—९।२६,३२;१८।४७ वि.

शिशुपाल—७।२७

शुकदेव—४।२

शुक्राचार्य—१०।३७

शेषनाग—१०।२९

संजय—१।१,१०;९।३२;११।९,

४९;१८।७५-७७

संभाजी—६।२१

संवर्तक—१४।२

सत्यकाम—१३।२५ परि.

सदन कसाई—९।३०

सनकादि—४।९;५।१९;७।१९;

१०।६,९,१२-१३

सप्तऋषि—१०।६

समाधि—९।३२

साध्य—११।२२

सीता—२।५;४।६;१६।१;

१८।६६ वि.

सुग्रीव—७।२२

सुनयना—१०।४-५

सुमेरु—१०।२३

सूरदास—१८।६६ वि.

सूर्य—४।१;७।८;९।१९;१०।२१;

१३।२९,३३;१५।६,१२

स्कन्द (कार्तिकेय)—१०।२४

हनुमान्—१।२०;२।५;१८।६६ वि.

हरिश्चन्द्र—३।३४,३५

हिमालय—१०।२५

पारिभाषिक शब्दावली

(साधक-संजीवनीके अनुसार)

अक्षौहिणी सेना—एक अक्षौहिणी सेनामें २१,८७० रथ,

२१,८७० हाथी, ६५,६१० घोड़े और १,०९,३५०

पैदल सैनिक होते हैं। (१।३ टि.)

अन्न—प्राणोंको धारण करनेके लिये जो खाया जाता है,

वह 'अन्न' कहलाता है। (३।१४)

अभिमान—अहंतावाली चीजोंको लेकर अर्थात् स्थूल,

सूक्ष्म और कारणशरीरको लेकर अपनेमें बड़प्पनका

अनुभव होना। (१६।४)

अमर्ष—किसीके उत्कर्ष (उन्नति)-को सहन न करना।

(१२।१५)

अर्पण—आदरपूर्वक देना और उसीकी वस्तु उसीको देना

'अर्पण' कहलाता है। (९।२७ परि.)

असुर—जो प्राणोंको बनाये रखना चाहते हैं, प्राणोंमें ही

जिनकी रति है, ऐसे प्राणपोषणपरायण लोग—

'असुषु प्राणेषु रमन्ते इति असुराः।' (१६।५)

अहंकृति—शरीरके साथ तादात्म्य माननेसे शरीरकी क्रियाको

लेकर 'मैं करता हूँ'—ऐसा भाव उत्पन्न होना

'अहंकृति' है। (१८।१७)

अहंस्फूर्ति—गाढ़ नींदसे उठते ही सबसे पहले मनुष्यको

अपने होनेपन (सत्तामात्र)-का भान होता है,

इसको 'अहंस्फूर्ति' कहते हैं। (१८।१७)

अहिंसा—(१) मन, वाणी और शरीरसे कभी किसीको

किंचिन्मात्र भी दुःख न देना। (१३।७)

(२) शरीर, मन, वाणी, भाव आदिके द्वारा

किसीका भी किसी प्रकारसे अनिष्ट न करनेको

तथा अनिष्ट न चाहना। (१६।२)

आततायी—आग लगानेवाला, विष देनेवाला, हाथमें

शस्त्र लेकर मारनेको तैयार हुआ, धनको हरनेवाला,

जमीन (राज्य) छीननेवाला और स्त्रीका हरण

करनेवाला—ये छः आततायी कहलाते हैं। (१।३६)

आधि और व्याधि—मनकी चिन्ता 'आधि' (मानसिक

रोग) है और शरीरका रोग 'व्याधि' (शारीरिक

रोग) है। आधि भी दो तरहकी होती है—

१. पागलपन और २. चिन्ता, शोक, भय, उद्वेग

आदि। (७।१६ टि.;१८।१२)

आर्जव—शरीर, वाणी आदिके व्यवहारमें सरलता हो और