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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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वस्तुओंको सत्पात्रका तथा देश, काल, परिस्थिति आदिका विचार रखते हुए आवश्यकतानुसार दूसरोंको वित्तीण कर देना। (१६।१)

दन्द्र — एक ही विषयमें, एक ही वस्तुमें दो भाव कर लेना। (२।४५ टि.)

धर्म — (१) 'धर्म' नाम दो बातोंका है—(क) दान करना, प्याऊ लगाना, अन्नक्षेत्र खोलना आदि परोपकारके कार्य करना और (ख) वर्ण-आश्रमके अनुसार शास्त्रविहित अपने कर्तव्य-कर्मका तत्परतासे पालन करना। (२।४०)

(२) धर्म कहो चाहे कर्तव्य कहो, एक ही बात है। (२।३९ परि.)

धृति (धैर्य)—(१) किसी भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितिमें विचलित न होकर अपनी स्थितिमें कायम रहनेकी शक्तिका नाम 'धृति' है। (१६।३)

(२) बुद्धिके निश्चयको, विचारको दृढ़तासे ठीक तरह रखनेवाली और अपने लक्ष्यसे विचलित न होने देनेवाली धारण-शक्तिका नाम 'धृति' है। (१८।२९)

(३) अपनी मान्यता, सिद्धान्त, लक्ष्य, भाव, क्रिया, वृत्ति, विचार आदिको दृढ़, अटल रखनेकी शक्तिका नाम 'धृति' है। (१८।३३)

नैष्कर्म्य —जिस स्थितिमें मनुष्यके कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् बन्धनकारक नहीं होते, उस स्थितिको 'नैष्कर्म्यता' कहते हैं। (३।४)

पण्डित —सत्-असत्-विवेकवती बुद्धिका नाम 'पण्डा' है। वह 'पण्डा' जिनकी विकसित हो गयी है, वे 'पण्डित' हैं। (२।११)

परमात्मा —'परमात्मा' शब्द निर्गुणका वाचक माना जाता है, जिसका अर्थ है—परम (श्रेष्ठ) आत्मा अथवा सम्पूर्ण जीवोंकी आत्मा। (१५।१७)

परलोक —मरनेके बाद जो जन्म होता है, वह चाहे मृत्युलोकमें हो, चाहे किसी अन्य लोकमें हो, चाहे मनुष्य, पशु-पक्षी आदि किसी योनिविशेषमें हो, वह सब 'परलोक' ही है। (१६।८ टि.)

परिग्रह —ममता-आसक्तिपूर्वक अपने सुखभोग और आरामके लिये धनादि पदार्थोंका संग्रह करना। (४।५)

पिशुनता (चुगली)—किसीके दोषको दूसरेके आगे प्रकट करके दूसरोंमें उसके प्रति दुर्भाव पैदा करना। (१६।२)

प्रकृति —जिसमें अच्छी रीतिसे क्रियाशीलता हो, उसको 'प्रकृति' कहते हैं—प्रकृषेण करणं (भावेल्युट्ट) इति प्रकृतिः।' (१८।११)

प्रमाद —(१) करनेलायक कामको न करना और न करनेलायक कामको करना। (१४।७)

(२) बीड़ी-सिगरेट, ताश-चौपड़, खेल-तमाशे आदि कार्यमें लगना। (१४।१३)

भय —इष्टके वियोग और अनिष्टके संयोगकी आशंकासे होनेवाले विकारको 'भय' कहते हैं। (१२।१५)

भूत-प्रेत —जो भूतयोनिमें चले गये हैं, उन्हें 'भूत' कहते हैं और जो मर गये हैं, उन्हें 'प्रेत' कहते हैं। (१७।४)

भोग —शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच विषय, शरीरका आराम, मान और नामकी बड़ाई—इन (आठों) के द्वारा सुख लेनेका नाम 'भोग' है। (२।४४)

मद —हमारे पास इतनी विद्या, बुद्धि, योग्यता आदि है—इस बातको लेकर नशा-सा आ जाना 'मद' है। (१६।१०)

महात्मा —महान् आत्मा अर्थात् अहंभाव, व्यक्तित्व, एकदेशीयतासे सर्वथा रहित आत्मा। (७।१९ परि.)

महारथी —जो शास्त्र और शास्त्रविद्या—दोनोंमें प्रवीण है और युद्धमें अकेले ही एक साथ दस हजार धनुर्धारी योद्धाओंका संचालन कर सकता है, वह वीर पुरुष 'महारथी' कहलाता है। (१।६)

मान-बड़ाई —शरीरका आदर-सत्कार होनेसे जो सुख होता है, वह 'मान' का सुख है। नामकी प्रशंसा, वाह-वाह होनेसे जो सुख होता है, वह 'बड़ाई' का सुख है। (१८।१२)

मार्दव —बिना कारण दुःख देनेवालों और वैर रखनेवालोंके प्रति भी अन्तःकरणमें कठोरताका भाव न होना तथा स्वाभाविक कोमलताका रहना। (१६।२)

मोह —शरीरमें अहंता और ममता करना तथा शरीर-सम्बन्धी माता-पिता, भाई-भौजाई, स्त्री-पुत्र, वस्तु, पदार्थ आदिमें ममता करना 'मोह' है। (२।५२)

यक्ष-राक्षस —'यक्ष' में धन-संग्रहकी मुख्यता और 'राक्षस' में दूसरोंका नाश करनेकी मुख्यता होती है। (१७।४)

यज्ञ —(१) गीताके अनुसार कर्तव्यमात्रका नाम 'यज्ञ' है। (३।९)

(२) निष्कामभावपूर्वक किये जानेवाले लौकिक और शास्त्रीय सभी विहित कर्मोंका नाम 'यज्ञ' है। (३।१४)

यज्ञशेष —यज्ञकी सिद्धिके बाद स्वतः अवशिष्ट रहनेवाला 'योग' अपने लिये होता है। यह योग (समता) ही यज्ञशेष है। (३।१३)

यज्ञार्थ कर्म —दूसरोंको सुख पहुँचाने तथा उनका हित करनेके लिये जो भी कर्म किये जाते हैं, वे सभी यज्ञार्थ कर्म हैं। (३।९)