श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ
पृष्ठ 13, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 13
( ७ )
| श्लोक-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|
| दुर्लभता बताना और भयभीत अर्जुनको आश्वासन देना..... | ७८८—७९५ | |
| (विशेष बात ७८९; संजय और अर्जुनकी दिव्यदृष्टि कबतक रही? ७९२) | ||
| ५१—५५ | भगवान्के द्वारा चतुर्भुजरूपकी महत्ता और उसके दर्शनका उपाय बताना..... | ७९५—८०२ |
| (विशेष बात ८००, ८०१) | ||
| ग्यारहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ... | ८०२ | |
| ग्यारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... | ८०२ | |
| बारहवाँ अध्याय | ||
| १—१२ | सगुण और निर्गुण-उपासकोंकी श्रेष्ठताका निर्णय और भगवत्प्राप्तिके चार साधनोंका वर्णन ..... | ८०३—८३६ |
| (विशेष बात ८११; विशेष बात—सगुण-उपासनाकी सुगमताएँ और निर्गुण-उपासनाकी कठिनताएँ ८१६; विशेष बात ८२३; भगवत्प्राप्ति-सम्बन्धी विशेष बात ८२५; कर्मफलत्याग-सम्बन्धी विशेष बात ८३३; साधन-सम्बन्धी विशेष बात ८३५) | ||
| १३—२० | सिद्ध-भक्तोंके उन्तालीस लक्षणोंका वर्णन ..... | ८३६—८५७ |
| (मामिक बात ८५१; प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात ८५२) | ||
| बारहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच... ८५७ | ||
| बारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... | ८५७ | |
| तेरहवाँ अध्याय | ||
| १—१८ | क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा), ज्ञान और ज्ञेय (परमात्मा)-का भक्ति-सहित विवेचन ..... | ८५९—८९२ |
| (मामिक बात ८६१; विशेष बात ८६८, ८६९, ८७२, ८८०) | ||
| १९—३४ | ज्ञानसहित प्रकृति-पुरुषका विवेचन ८९२—९१४ | |
| (मामिक बात ९०४) | ||
| तेरहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ..... | ९१४ | |
| तेरहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... | ९१४ | |
| चौदहवाँ अध्याय | ||
| १—४ | ज्ञानकी महिमा और प्रकृति-पुरुषसे जगत्की उत्पत्ति ..... | ९१५—९१९ |
| ५—१८ | सत्त्व, रज और तम—इन तीनों |
| श्लोक-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|
| गुणोंका विवेचन ..... | ९१९—९३९ | |
| (विशेष बात ९२०, ९२६; मामिक बात ९३१; विशेष बात ९३६, ९३८) | ||
| १९—२७ | भगवत्प्राप्तिका उपाय एवं गुणातीत पुरुषके लक्षण..... | ९३९—९५० |
| (विशेष बात ९४३) | ||
| चौदहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ..... | ९५० | |
| चौदहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... | ९५० | |
| पंद्रहवाँ अध्याय | ||
| १—६ | संसार-वृक्षका तथा उसका छेदन करके भगवान्के शरण होनेका और भगवद्भ्रामका वर्णन ..... | ९५१—९७१ |
| (विशेष बात ९५९; वैराग्य-सम्बन्धी विशेष बात ९६०; संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदके कुछ सुगम उपाय ९६१; विशेष बात ९६७, ९६८) | ||
| ७—११ | जीवात्माका स्वरूप तथा उसे जानने-वाले और न जानेवालेका वर्णन... ९७२—९९० | |
| (विशेष बात ९७४, ९८१, ९८२; मामिक बात ९८४, ९८७) | ||
| १२—१५ | भगवान्के प्रभावका वर्णन..... | ९९०—९९९ |
| (परमात्मप्राप्ति-सम्बन्धी विशेष बात ९९५; प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात ९९७; मामिक बात ९९९) | ||
| १६—२० | क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तमका वर्णन तथा अध्यायका उपसंहार... ९९९—१००९ | |
| (मामिक बात १००२; विशेष बात १००४) पंद्रहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ..... | १००९ | |
| पंद्रहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... | १००९ | |
| पंद्रहवें अध्यायका सार..... | १००९—१०१० | |
| सोलहवाँ अध्याय | ||
| १—५ | फलसहित दैवी और आसुरी सम्पत्तिका वर्णन..... | १०१२—१०३४ |
| (मामिक बात १०२८, १०३०) | ||
| ६—८ | सत्कर्मोंसे विमुक्त हुए आसुरी-सम्पत्तिवाले मनुष्योंकी मान्यताओं-का कथन ..... | १०३५—१०४१ |
| (विशेष बात १०३९) | ||
| ९—१६ | आसुरी-सम्पत्तिवाले मनुष्योंके दुराचारों और मनोरथोंका फल-सहित वर्णन ..... | १०४१—१०४९ |
| १७—२० | आसुरी-सम्पत्तिवाले मनुष्योंके |