श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ५२]
- साधक-संजीवनी *
१३७
आदि दोष किंचिन्मात्र भी नहीं रहते; अतः उनके पुनर्जन्मका कारण ही नहीं रहता। वे जन्म-मरणरूप बन्धनसे सदाके लिये मुक्त हो जाते हैं।
‘पदं गच्छन्त्यनामयम्’ —‘आमय’ नाम रोगका है। रोग एक विकार है। जिसमें किंचिन्मात्र भी किसी प्रकारका विकार न हो, उसको ‘अनामय’ अर्थात् निर्विकार कहते हैं। समतायुक्त मनीषीलोग ऐसे निर्विकार पदको प्राप्त हो जाते हैं। इसी निर्विकार पदको पन्द्रहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें ‘अव्यय पद’ और अठारहवें अध्यायके छ्पनवें श्लोकमें ‘शाश्वत अव्यय पद’ नामसे कहा गया है।
यद्यपि गीतामें सत्त्वगुणको भी अनामय कहा गया है (१४।६), पर वास्तवमें अनामय (निर्विकार) तो अपना स्वरूप अथवा परमात्मतत्त्व ही है; क्योंकि वह गुणातीत तत्त्व है, जिसको प्राप्त होकर फिर किसीको भी जन्म-मरणके चक्करमें नहीं आना पड़ता। परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें हेतु होनेसे भगवान्ने सत्त्वगुणको भी अनामय कह दिया है।
अनामय पदको प्राप्त होना क्या है? प्रकृति विकारशील
परिशिष्ट भाव —कर्मोंमें योग (समता) ही कुशलता क्यों है—इसका कारण ‘हि’ पदसे इस श्लोकमें बताते हैं। सात्त्विक कर्मका फल निर्मल है, राजस कर्मका फल दुःख है और तामस कर्मका फल मूढ़ता है (गीता—चौदहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)—इन तीनों प्रकारके फलोंका समतायुक्त मनुष्य त्याग कर देता है। कर्मजन्य फलके त्यागके दो अर्थ हैं—फलकी इच्छाका त्याग करना और कर्मके फलस्वरूप अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति प्राप्त होनेपर सुखी-दुःखी न होना।
वास्तवमें उत्पत्ति-विनाशशील सम्पूर्ण संसार कर्मफलके सिवाय और कुछ है ही नहीं। कर्मफलका त्याग कर दें तो फिर कोई भी बन्धन बाकी नहीं रहता।
‘मनीषी’ शब्दका अर्थ है—बुद्धिमान्। पूर्वश्लोकके अनुसार समतापूर्वक कर्म करना ही बुद्धिमत्ता है—‘स बुद्धिमान्मुण्येषु’ (गीता ४।१८)।
‘पदं गच्छन्त्यनामयम्’ —‘गच्छन्ति’ पदके तीन अर्थ होते हैं—१-ज्ञान होना, २-गमन करना और ३-प्राप्त होना। यहाँ निर्विकार पदकी प्राप्तिका अर्थ है—जन्म-मरणसे रहितपनेका और निर्विकार पदकी स्वतःसिद्ध प्राप्तिका ज्ञान हो जाना। कारण कि नित्य-निवृत्तकी ही निवृत्ति होती है और नित्यप्राप्तकी ही प्राप्ति होती है।
इस श्लोकसे यह सिद्ध होता है कि कर्मयोग मुक्तिका, कल्याणप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन है। कर्मयोगसे संसारकी निवृत्ति और परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति—दोनों हो जाते हैं।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें बताये अनामय पदकी प्राप्तिका क्रम क्या है—इसे आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिव्यतिरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥ ५२ ॥
| यदा | = जिस समय | व्यतिरिष्यति | = भलीभाँति तर | श्रोतव्यस्य | = सुननेमें |
|---|---|---|---|---|---|
| ते | = तेरी | जायगी, | आनेवाले | ||
| बुद्धिः | = बुद्धि | तदा | = उसी समय (तू) | (भोगोंसे) | |
| मोहकलिलम् | = मोहरूपी | श्रुतस्य | = सुने हुए | निर्वेदम् | = वैराग्यको |
| दलदलको | च | = और | गन्तासि | = प्राप्त हो जायगा। |