भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक ७० ]

  • साधक-संजीवनी *

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वादिनः (गीता २।४२)। ‘कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः’ (गीता १६।११)। पारमार्थिक विषयमें उनकी बुद्धि जाती ही नहीं। परन्तु पारमार्थिक साधक पारमार्थिक विषयके साथ-साथ संसारको भी जानते हैं, इसलिये उनके लिये ‘पश्यतः’ पद दिया है। संसारी लोग तो केवल रातको ही देखते हैं, दिनको देखते ही नहीं, पर योगी दिनको भी देखता है और रातको भी—यह दोनोंमें फर्क है। उदाहरणार्थ बालकने केवल बालकपना ही देखा है, जवानी नहीं, पर वृद्ध पुरुषने वृद्धावस्थाके साथ-साथ बालकपना भी देखा है और जवानी भी! रुपये रखनेवाला व्यक्ति रुपयोंके त्यागको नहीं जानता, पर रुपयोंका त्याग करनेवाला रुपयोंके संग्रहको भी जानता है और त्यागको भी जानता है। यह सिद्धान्त है कि संसारमें लगा हुआ मनुष्य संसारको नहीं जान सकता। संसारसे अलग होकर ही वह संसारको जान सकता है; क्योंकि वास्तवमें वह संसारसे अलग है। इसी तरह परमात्माके साथ एक होकर ही मनुष्य परमात्माको जान सकता है; क्योंकि वास्तवमें वह परमात्माके साथ एक है।

जो ‘है’ में स्थित है, वह ‘है’ और ‘नहीं’—दोनोंको जानता है, पर जो ‘नहीं’ में स्थित है, वह ‘नहीं’ को भी यथार्थरूपसे अर्थात् ‘नहीं’-रूपसे नहीं जान सकता, फिर वह ‘है’ को कैसे जानेगा ? नहीं जान सकता। उसमें जानेकी सामर्थ्य ही नहीं है। ‘है’ को जाननेवालेका तो ‘नहीं’ को माननेवालेके साथ विरोध नहीं होता, पर ‘नहीं’ को माननेवालेका ‘है’ को जाननेवालेके साथ विरोध होता है।

सम्बन्ध—मननशील संयमी मनुष्यको संसार रातकी तरह दीखता है। इसपर यह प्रश्न उठता है कि क्या वह सांसारिक पदार्थोंके सम्पर्कमें आता ही नहीं? अगर नहीं आता तो उसका जीवन-निर्वाह कैसे होता है? और अगर आता है तो उसकी स्थिति कैसे रहती है? इन बातोंका विवेचन करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्भूत।

तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ ७० ॥

यद्भूत= जैसेअचलप्रतिष्ठम्= (समुद्र अपनी मर्यादामें) अचल स्थित रहता है,ही)प्रविशन्ति= प्राप्त होते हैं,
आपः= (सम्पूर्ण नदियोंका) जलतद्वत्= ऐसे हीसः= वही मनुष्य
आपूर्यमाणम्= चारों ओरसे जलद्वारासर्वे= सम्पूर्णशान्तिम्= परमशान्तिको
परिपूर्णकामाः= भोग-पदार्थआप्नोति= प्राप्त होता है,
समुद्रम्= समुद्रमेंयम्= जिस संयमीकामकामी= भोगोंकी कामनावाला
प्रविशन्ति= आकर मिलता है, (पर)मनुष्यको (विकार उत्पन्न किये बिना= नहीं।

व्याख्या—‘आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्भूत’ —वर्षाकालमें नदियों और नदोंका जल बहुत बढ़ जाता है, कई नदियोंमें बाढ़ आ जाती है; परन्तु जब वह जल चारों ओरसे जलद्वारा परिपूर्ण समुद्रमें आकर मिलता है, तब समुद्र बढ़ता नहीं, अपनी मर्यादामें ही रहता है। परन्तु जब गरमीके दिनोंमें नदियों और नदोंका जल बहुत कम हो जाता है, तब समुद्र घटता नहीं। तात्पर्य है कि नदी-नदोंका जल ज्यादा आनेसे अथवा कम आनेसे या न

आनेसे तथा बड़वानल (जलमें पैदा होनेवाली अग्नि) और सूर्यके द्वारा जलका शोषण होनेसे समुद्रमें कोई फर्क नहीं पड़ता, वह बढ़ता-घटता नहीं। उसको नदी-नदोंके जलकी अपेक्षा नहीं रहती। वह तो सदा-सर्वदा ज्यों-का-त्यों ही परिपूर्ण रहता है और अपनी मर्यादाका कभी त्याग नहीं करता।

‘तद्वत्कामा’* यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्ति-माप्नोति’—ऐसे ही संसारके सम्पूर्ण भोग उस परमात्म-

  • यहाँ ‘कामाः’ पद कामनाओंका वाचक नहीं है, प्रत्युत जिन पदार्थोंकी कामना की जाती है, उन भोग-पदार्थोंका वाचक है।