श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 162, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ७१ ] * साधक-संजीवनी * १६१
वस्तुओंका सेवन करता ही नहीं। वह निर्वाहकी वस्तुओंका
सेवन भी करता है, पथ्य-कुपथ्यका भी ध्यान रखता है
अर्थात् पहले साधनास्थामें शरीर आदिके साथ जैसा
व्यवहार करता था, वैसा ही व्यवहार अब भी करता है;
परन्तु शरीर बना रहे तो अच्छा है, जीवन-निर्वाहकी वस्तुएँ
मिलती रहें तो अच्छा है—ऐसी उसके भीतर कोई परवाह
नहीं होती।
इसी अध्यायके पचपनवें श्लोकमें 'प्रजहाति यदा
कामान्सर्वान्' पदोंसे कामना-त्यागकी जो बात कही थी,
वही बात यहाँ 'विहाय कामान्यः सर्वान्' पदोंसे कही है।
इसका तात्पर्य है कि कर्मयोगमें सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग
किये बिना कोई स्थितप्रज्ञ नहीं हो सकता; क्योंकि
कामनाओंके कारण ही संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ा हुआ
है। कामनाओंका सर्वथा त्याग करनेपर संसारके साथ
सम्बन्ध रह ही नहीं सकता।
'निर्ममः'—स्थितप्रज्ञ महापुरुष ममताका सर्वथा त्याग
कर देता है। मनुष्य जिन वस्तुओंको अपनी मानता है, वे
वास्तवमें अपनी नहीं हैं, प्रत्युत संसारसे मिली हुई हैं। मिली
हुई वस्तुको अपनी मानना भूल है। यह भूल मिट जानेपर
स्थितप्रज्ञ वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, शरीर, इन्द्रियाँ आदिमें
ममतारहित हो जाता है।
'निरहङ्कारः'—यह शरीर मैं ही हूँ—इस तरह शरीरसे
तादात्म्य मानना अहंकार है। स्थितप्रज्ञमें यह अहंकार नहीं
रहता। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सभी किसी
प्रकाशमें दीखते हैं और जो 'मैं'-पन है, उसका भी किसी
प्रकाशमें भान होता है। अतः प्रकाशकी दृष्टिसे शरीर,
इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंता ('मैं'-पन)—ये सभी दृश्य हैं।
द्रष्टा दृश्यसे अलग होता है—यह नियम है। ऐसा अनुभव
हो जानेसे स्थितप्रज्ञ निरहंकार हो जाता है।
'स शान्तिमधिगच्छति'—स्थितप्रज्ञ शान्तिको प्राप्त
होता है। कामना, स्पृहा, ममता और अहंतासे रहित होनेपर
शान्ति आकर प्राप्त होती है—ऐसी बात नहीं है, प्रत्युत
शान्ति तो मनुष्यमात्रमें स्वतःसिद्ध है। केवल उत्पन्न एवं
नष्ट होनेवाली वस्तुओंसे सुख भोगनेकी कामना करनेसे,
उनसे ममताका सम्बन्ध रखनेसे ही अशान्ति होती है। जब
संसारकी कामना, स्पृहा, ममता और अहंता सर्वथा छूट
जाती है, तब स्वतःसिद्ध शान्तिका अनुभव हो जाता है।
इस श्लोकमें कामना, स्पृहा, ममता और अहंता—इन
चारोंमें अहंता ही मुख्य है। कारण कि एक अहंताके
निषेधसे सबका निषेध हो जाता है अर्थात् यदि 'मैं'-पन
ही नहीं रहेगा, तो फिर 'मेरा'-पन कैसे रहेगा और कामना
भी कौन करेगा और किसलिये करेगा?
जब 'निरहङ्कारः' कहनेमात्रसे कामना आदिका त्याग
उसके अन्तर्गत आ जाता था, तो फिर कामना आदिके
त्यागका वर्णन क्यों किया? इसका उत्तर यह है कि कामना,
स्पृहा, ममता और अहंता—इन चारोंमें कामना स्थूल है।
कामनासे सूक्ष्म स्पृहा, स्पृहासे सूक्ष्म ममता और ममतासे
सूक्ष्म अहंता है। अतः साधक पहले कामना, स्पृहा और
ममताका त्याग कर दे तो अहंताका त्याग करना उसके लिये
सुगम हो जायगा।
शास्त्रीय दृष्टिसे पहले कामनाका त्याग, फिर स्पृहा,
ममता और अहंकारका त्याग बताया जाता है। परन्तु
साधककी दृष्टिसे पहले ममताका त्याग, फिर कामना,
स्पृहा और अहंकारका त्याग करना ही ठीक है। ममता
प्राप्त वस्तुकी और कामना अप्राप्त वस्तुकी होती है। सबसे
पहले ममताका त्याग करना सुगम पड़ता है। मनुष्य पहले
ममतासे अर्थात् प्राप्त वस्तुके सम्बन्धसे ही फँसता है। पहले
ममताका त्याग करनेसे निष्काम होनेकी सामर्थ्य आ जाती
है, कामनाका त्याग करनेसे निःस्पृह होनेकी सामर्थ्य आ
जाती है और स्पृहाका त्याग करनेसे निरहंकार होनेकी
सामर्थ्य आ जाती है। शास्त्रीय दृष्टिके अनुसार चलनेसे
मनुष्य पण्डित हो जाता है और साधककी दृष्टिके अनुसार
चलनेसे मनुष्यको अनुभव हो जाता है।
अहंता-ममतासे रहित होनेका उपाय
कर्मयोगकी दृष्टिसे—'मेरा कुछ नहीं है'; क्योंकि मेरा
किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना, अवस्था आदिपर
स्वतन्त्र अधिकार नहीं है। जब मेरा कुछ नहीं है तो 'मेरेको
कुछ नहीं चाहिये'; क्योंकि अगर शरीर मेरा है तो मेरेको
अन्न, जल, वस्त्र आदिकी आवश्यकता है, पर जब शरीर
मेरा है ही नहीं, तो मेरेको किसीकी कुछ भी आवश्यकता
नहीं है। जब मेरा कुछ नहीं और मेरेको कुछ नहीं चाहिये,
तो फिर 'मैं' क्या रहा? क्योंकि 'मैं' तो किसी वस्तु,
शरीर, स्थिति आदिको पकड़नेसे ही होता है।
मेरे कहलानेवाले शरीर आदिका संसारके साथ
सर्वथा अभिन्न सम्बन्ध है। इसलिये अपने कहलानेवाले शरीर
आदिसे जो कुछ करना है, वह सब केवल संसारके हितके
लिये ही करना है; क्योंकि मेरेको कुछ चाहिये ही नहीं। ऐसा
भाव होनेपर 'मैं'-का एकदेशीयपना आप-से-आप मिट