श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 164, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ७२ ]
- साधक-संजीवनी *
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‘कामना’ और ‘स्मृहा’—दोनोंका त्याग करनेका तात्पर्य है कि वस्तुओंकी कामना भी न हो और निर्वाहमात्रकी कामना (शरीरकी आवश्यकता) भी न हो। कारण कि निर्वाहमात्रकी कामना भी सुखभोग ही है। इतना ही नहीं, शान्ति, मुक्ति, तत्त्वज्ञान आदिको प्राप्त करनेकी इच्छा भी कामना है। अतः निष्कामभावमें मुक्तितककी भी कामना नहीं होनी चाहिये।
इस श्लोकमें अपरा प्रकृतिका निषेध है। जीवने अहंकारके कारण अपरा प्रकृति (जगत्) को धारण किया है—‘ययेदं धारयते जगत्’ (गीता ७।५)। अतः निरहंकार होनेपर अपरा प्रकृतिका निषेध (सम्बन्ध-विच्छेद) हो जाता है और जीव जन्म-मरणरूप बन्धनसे मुक्त हो जाता है। सबका त्याग होनेपर भी अहंकार शेष रह जाता है, पर अहंकारका त्याग होनेपर सबका त्याग हो जाता है।
सम्बन्ध—कामना, स्मृहा, ममता और अहंतासे रहित होनेपर उसकी क्या स्थिति होती है—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हुए इस विषयका उपसंहार करते हैं।
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥
| पार्थ | = हे पृथानन्दन ! | कोई) | अपि | = भी |
|---|---|---|---|---|
| एषा | = यह | न, विमुह्यति | = मोहित नहीं | स्थित्वा |
| ब्राह्मी | = ब्राह्मी | होता । | (तो) | |
| स्थितिः | = स्थिति है । | अस्याम् | = इस स्थितिमें | ब्रह्मनिर्वाणम् |
| एनाम् | = इसको | (यदि) | ब्रह्मकी | |
| प्राप्य | = प्राप्त होकर (कभी | अन्तकाले | = अन्तकालमें | ऋच्छति |
व्याख्या—‘एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ’— यह ब्राह्मी स्थिति है अर्थात् ब्रह्मको प्राप्त हुए मनुष्यकी स्थिति है। अहंकाररहित होनेसे जब व्यक्तित्व मिट जाता है, तब उसकी स्थिति स्वतः ही ब्रह्ममें होती है। कारण कि संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही व्यक्तित्व था। उस सम्बन्धको सर्वथा छोड़ देनेसे योगीकी अपनी कोई व्यक्तिगत स्थिति नहीं रहती।
अत्यन्त नजदीकका वाचक होनेसे यहाँ ‘एषा’ पद पूर्वश्लोकमें आये ‘विहाय कामान्’, ‘निःस्मृहः’, ‘निर्ममः’ और ‘निरहङ्कारः’ पदोंका लक्ष्य करता है।
भगवान्के मुखसे ‘तेरी बुद्धि जब मोहकलिल और श्रुतिविप्रतिपत्तिसे तर जायगी, तब तू योगको प्राप्त हो जायगा’—ऐसा सुनकर अर्जुनके मनमें यह जिज्ञासा हुई कि वह स्थिति क्या होगी ? इसपर अर्जुनने स्थितप्रज्ञके विषयमें चार प्रश्न किये। उन चारों प्रश्नोंका उत्तर देकर भगवान्ने यहाँ वह स्थिति बतायी कि वह ब्राह्मी स्थिति है। तात्पर्य है कि वह व्यक्तिगत स्थिति नहीं है अर्थात् उसमें व्यक्तित्व
नहीं रहता। वह नित्ययोगकी प्राप्ति है। उसमें एक ही तत्त्व रहता है। इस विषयकी तरफ लक्ष्य करनेके लिये ही यहाँ ‘पार्थ’ सम्बोधन दिया गया है।
‘नैनां प्राप्य विमुह्यति’— जबतक शरीरमें अहंकार रहता है, तभीतक मोहित होनेकी सम्भावना रहती है। परन्तु जब अहंकारका सर्वथा अभाव होकर ब्रह्ममें अपनी स्थितिका अनुभव हो जाता है, तब व्यक्तित्व टूटनेके कारण फिर कभी मोहित होनेकी सम्भावना नहीं रहती।
सत् और असत्को ठीक तरहसे न जानना ही मोह है। तात्पर्य है कि स्वयं सत् होते हुए भी असत्के साथ अपनी एकता मानते रहना ही मोह है। जब साधक असत्को ठीक तरहसे जान लेता है, तब असत्से उसका सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है* और सत्में अपनी वास्तविक स्थितिका अनुभव हो जाता है। इस स्थितिका अनुभव होनेपर फिर कभी मोह नहीं होता (गीता—चौथे अध्यायका पैंतीसवाँ श्लोक)।
‘स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति’— यह मनुष्य-शरीर केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है।
- असत्को जाननेसे असत्को निवृत्ति हो जाती है; क्योंकि असत्की स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। सत्से ही असत्को सत्ता मिलती है। अगर असत्को जाननेसे असत्की निवृत्ति न हो तो वास्तवमें असत्को जाना ही नहीं है; प्रत्युत सीखा है। सीखे हुए ज्ञानसे असत्की निवृत्ति नहीं होती; क्योंकि मनमें असत्की सत्ता रहती है।