श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ‘सांख्ययोग’ नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ।
कर्मयोग, सांख्ययोग, भक्तियोग आदि सभी साधनोंमें विवेककी बड़ी आवश्यकता है। सांख्ययोगमें इस विवेककी मुख्यता है और सांख्ययोगसे ही भगवान्ने अपना उपदेश आरम्भ किया है; अतः इस अध्यायका नाम ‘सांख्ययोग’ रखा गया है।
दूसरे अध्यायके पद, अक्षर और उवाच
(१) इस अध्यायमें ‘अथ द्वितीयोऽध्यायः’ के तीन, ‘संजय उवाच’, ‘श्रीभगवानुवाच’ आदि पदोंके चौदह, श्लोकोंके नौ सौ सत्तावन और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग नौ सौ सत्तासी है।
(२) इस अध्यायमें ‘अथ द्वितीयोऽध्यायः’ के सात, ‘संजय उवाच’, ‘श्रीभगवानुवाच’ आदि पदोंके पैतालिस, श्लोकोंके दो हजार चार सौ तीन और पुष्पिकाके पैतालिस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग दो हजार पाँच सौ है। इस अध्यायके बहतर श्लोकोंमेंसे पाँचवाँ, सातवाँ, आठवाँ, बीसवाँ, बाईसवाँ और सत्तरवाँ—ये छः श्लोक चौवालीस अक्षरोंके, छठ श्लोक छियालीस अक्षरोंका और उन्तीसवाँ श्लोक पैतालिस अक्षरोंका है। शेष चौंसठ श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें सात उवाच हैं—दो ‘संजय उवाच’, तीन ‘श्रीभगवानुवाच’ और दो ‘अर्जुन उवाच’।
दूसरे अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायके बहतर श्लोकोंमेंसे पाँचवाँ, छठ, सातवाँ, आठवाँ, बीसवाँ, बाईसवाँ, उन्तीसवाँ और सत्तरवाँ—ये आठ श्लोक ‘उपजाति’ छन्दवाले हैं। दूसरे अध्यायमें बावनवाँ और सड़सठवाँ श्लोकके प्रथम चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘न-विपुला’; बारहवाँ, छब्बीसवाँ और बत्तीसवाँ श्लोकके प्रथम चरणमें तथा इकसठवाँ और तिरसठवाँ श्लोकके तृतीय चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘र-विपुला’; छत्तीसवाँ और छप्पनवाँ श्लोकके प्रथम चरणमें ‘भगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘भ-विपुला’; इकहत्तरवाँ श्लोकके प्रथम चरणमें और इकत्तीसवाँ श्लोकके तृतीय चरणमें ‘मगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘म-विपुला’; छियालीसवाँ श्लोकके प्रथम चरणमें ‘सगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘स-विपुला’; पैतीसवाँ श्लोकके प्रथम और तृतीय चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘जातिपक्ष-विपुला’ और सैतालीसवाँ श्लोकके प्रथम चरणमें ‘भगण’ तथा तृतीय चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘संकीर्ण-विपुला’ संज्ञावाले छन्द हैं। शेष उनचास श्लोक ठीक ‘पध्यावक्त्र’ अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।