भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ३ ]

जानेपर संसारका महत्त्व, आकर्षण, खिंचाव स्वतः मिटने लग जाता है। ऐसी निश्चयात्मिका बुद्धि होनेमें भोग और संग्रहकी आसक्तिको महान् बाधक बताया गया है (गीता—दूसरे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक)।

इस तरह कर्मयोगमें निश्चयात्मिका बुद्धिकी अत्यन्त आवश्यकता बतानेके बाद भगवान् अर्जुनको समभावपूर्वक कर्तव्यकर्म करनेके लिये विशेषरूपसे कहते हैं; जैसे—‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ (२। ४७), ‘योगस्थः कुरु कर्माणि’ (२। ४८) ‘तेरा कर्म करनेमें ही अधिकार है’, ‘समतामें स्थित हुआ तू कर्मोंको कर’। इसके साथ यह भी कहते हैं कि ‘दूरेण ह्यवर्ं कर्म बुद्धियोगात्’ (२। ४९) ‘बुद्धियोग-(समता-) से सकामकर्म अत्यन्त तुच्छ है’, आगे कहते हैं—‘बुद्धौ शरणमन्विच्छ’ (२। ४९), ‘बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥’ (२। ५०) ‘तू समबुद्धिका आश्रय ग्रहण कर’ ‘समतापूर्वक कर्म करनेवाला पुरुष पाप और पुण्य—दोनोंका यहाँ जीवित-अवस्थामें ही त्याग कर देता है, इसलिये तू समताकी प्राप्तिके लिये ही प्रयत्न कर; क्योंकि समता ही कर्मोंमें चतुरता है।’

अर्जुनके मनमें युद्ध न करनेका आग्रह पहलेसे ही था। पहले अध्यायके इकतीसवाँ श्लोकमें अर्जुन कहते हैं—‘युद्धमें अपने कुलको मारकर मैं अपना हित नहीं देखता’—‘न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे।’ फिर पैतालीसवाँ श्लोकमें वे कहते हैं—‘अहो! शोक है कि हमलोग बुद्धिमान् होकर भी युद्धरूप महान् पाप करनेको तैयार हो गये हैं’—‘अहो बत महत्यापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।’ आगे दूसरे अध्यायके पाँचवाँ श्लोकमें अर्जुन कहते हैं—‘मैं भिक्षाका अन्न खाना श्रेष्ठ समझता हूँ, पर युद्ध करना नहीं’—‘श्रेयो भोक्तुं श्वेक्ष्यमपीह लोके’ और नवाँ श्लोकमें तो भगवान्की आज्ञा ‘उत्तिष्ठ परन्तप’ (२। ३) के विरुद्ध अपना निर्णय ही सुना देते हैं कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’—‘न योत्ये’ (गीता २। ९)।

यह नियम है कि अपना आग्रह रखनेसे श्रोता वक्ताकी बातोंका आशय अच्छी तरहसे नहीं समझ सकता। यही कारण है कि अपना (युद्ध न करनेका) आग्रह रखनेसे अर्जुन भी उपर्युक्त प्रकरणमें भगवान्के वचनोंका आशय अच्छी तरहसे नहीं समझ सके। अतः अर्जुनको भगवान्के वचन मिले हुए—से जान पड़ने लगे। इसलिये भगवान्का अभिप्राय क्या है ? वे मेरे कल्याणके लिये कौन-सा साधन श्रेष्ठ समझते हैं— इसका खुलासा करानेके लिये अर्जुन आगेके दो श्लोकोंमें भगवान्से प्रश्न करते हैं।

अर्जुन उवाच

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं कर्माणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥ व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे। तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाजुयाम् ॥ २ ॥

अर्जुन बोले—

जनार्दन= हे जनार्दन!तत्= तो फिरव्यामिश्रेण, इव = (आप अपने)
चेत्= अगरकेशव= हे केशव!मिले हुए—से
ते= आपमाम्= मुझेवाक्येन = वचनोंसे
कर्मणः= कर्मसेघोरे= घोरमे = मेरी
बुद्धिः= बुद्धि (ज्ञान) कोकर्माणि= कर्ममेंबुद्धिम् = बुद्धिको
ज्यायसी= श्रेष्ठकिम्= क्योंमोहयसि, इव = मोहित-सी कर
मता= मानते हैं,नियोजयसि= लगाते हैं ?रहे हैं।