भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 202

श्लोक १८ ] * साधक-संजीवनी * २०१

(किसी भी | अस्य = इसका | अर्थव्याश्रय: = स्वार्थका सम्बन्ध

प्राणीके साथ) | कश्चित् = किंचिन्मात्र भी | न = नहीं रहता।

व्याख्या-'नैव तस्य कृतेनार्थ:'-प्रत्येक मनुष्यकी | होता है। अतः उसका शरीरादिकी क्रियाओंसे अपना कोई

कुछ-न-कुछ करनेकी प्रवृत्ति होती है। जबतक यह करनेकी | प्रयोजन नहीं रहता। प्रयोजन न रहनेपर भी उस महापुरुषसे

प्रवृत्ति किसी सांसारिक वस्तुकी प्राप्तिके लिये होती है, | स्वाभाविक ही लोगोंके लिये आदर्शरूप उत्तम कर्म होते

तबतक उसका अपने लिये 'करना' शेष रहता ही है। अपने | हैं। जिसका कर्म करनेसे प्रयोजन रहता है, उससे आदर्श

लिये कुछ-न-कुछ पानेकी इच्छासे ही मनुष्य बँधता है। उस | कर्म नहीं होते-यह सिद्धान्त है।

इच्छाकी निवृत्तिके लिये कर्तव्य-कर्म करनेकी आवश्यकता है। | 'नाकृतेनेह कश्चन'-जो मनुष्य शरीर, इन्द्रियाँ,

कर्म दो प्रकारसे किये जाते हैं। कामना-पूर्तिके लिये | मन, बुद्धि आदिसे अपना सम्बन्ध मानता है और आलस्य,

और कामना-निवृत्तिके लिये। साधारण मनुष्य तो कामनापूर्तिके | प्रमाद आदिमें रुचि रखता है, वह कर्मोंको नहीं करना

लिये कर्म करते हैं, पर कर्मयोगी कामना-निवृत्तिके लिये | चाहता; क्योंकि उसका प्रयोजन प्रमाद, आलस्य, आराम

कर्म करता है। इसलिये कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषमें कोई | आदिसे उत्पन्न तामस-सुख रहता है (गीता-अठारहवें

भी कामना न रहनेके कारण उसका किसी भी कर्तव्यसे | अध्यायका उनतालीसवाँ श्लोक)। परन्तु यह महापुरुष, जो

किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता। उसके द्वारा निःस्वार्थ- | सात्त्विक सुखसे भी ऊँचा उठ चुका है, तामस सुखमें प्रवृत्त

भावसे समस्त सृष्टिके हितके लिये स्वतः कर्तव्य-कर्म | हो ही कैसे सकता है? क्योंकि इसका शरीरादिसे

होते हैं। | किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता, फिर आलस्य-आराम

कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषका कर्मोंसे अपने लिये | आदिमें रुचि रहनेका तो प्रश्न ही नहीं उठता।

(व्यक्तिगत सुख-आरामके लिये) कोई सम्बन्ध नहीं | मार्मिक बात

रहता। इस महापुरुषका यह अनुभव होता है कि पदार्थ, | प्रायः साधक कर्मोंके न करनेही महत्त्व देते हैं।

शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण आदि केवल संसारके हैं और | वे कर्मोंसे उपरत होकर समाधिमें स्थित होना चाहते हैं,

संसारसे मिले हैं, व्यक्तिगत नहीं हैं। अतः इनके द्वारा केवल | जिससे कोई भी चिन्तन बाकी न रहे। यह बात श्रेष्ठ और

संसारके लिये ही कर्म करना है, अपने लिये नहीं। कारण | लाभप्रद तो है, पर सिद्धान्त नहीं है। यद्यपि प्रवृत्ति-

यह है कि संसारकी सहायताके बिना कोई भी कर्म नहीं | (करना-) की अपेक्षा निवृत्ति (न करना) श्रेष्ठ है, तथापि

किया जा सकता। इसके अलावा मिली हुई कर्म-सामग्रीका | यह तत्त्व नहीं है।

सम्बन्ध भी समष्टि संसारके साथ ही है, अपने साथ नहीं। | प्रवृत्ति (करना) और निवृत्ति (न करना)-दोनों ही

इसलिये अपना कुछ नहीं है। व्यष्टिके लिये समष्टि हो ही | प्रकृतिके राज्यमें हैं। निर्विकल्प समाधित सब प्रकृतिका

नहीं सकती। मनुष्यकी यही गलती होती है कि वह अपने | राज्य है; क्योंकि निर्विकल्प समाधिसे भी व्युत्थान होता है।

लिये समष्टिका उपयोग करना चाहता है इसीसे उसे | क्रियामात्र प्रकृतिमें ही होती है-'प्रकर्षेण करणं ( भावे

अशान्ति होती है। अगर वह शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, | ल्युट् ) इति प्रकृतिः', और क्रिया हुए बिना व्युत्थानका

पदार्थ आदिका समष्टिके लिये उपयोग करे तो उसे महान् | होना सम्भव ही नहीं। इसलिये चलने, बोलने, देखने, सुनने

शान्ति प्राप्त हो सकती है। कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषमें यही | आदिकी तरह सोना, बैठना, खड़ा होना, मौन होना, मूर्च्छित

विशेषता रहती है कि उसके कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, | होना और समाधिस्थ होना भी क्रिया है*। वास्तविक

मन, बुद्धि, पदार्थ आदिका उपयोग मात्र संसारके लिये ही | तत्त्व-(चेतन स्वरूप-)में प्रवृत्ति और निवृत्ति-दोनों ही

  • प्रकृति निरन्तर क्रियाशील है, इसलिये उससे सम्बन्ध रखते हुए कोई भी प्राणी किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी

कर्म किये बिना नहीं रह सकता (गीता ३।५; १८।११)। अतः जबतक प्रकृतिका सम्बन्ध है, तबतक समाधि भी कर्म

ही है, जिसमें समाधि और व्युत्थान-ये दो अवस्थाएँ होती हैं। परन्तु प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर दो अवस्थाएँ नहीं होतीं,

प्रत्युत 'सहज समाधि' अथवा 'सहजावस्था' होती है, जिससे कभी व्युत्थान नहीं होता। कारण कि अवस्थाभेद प्रकृतिमें है,

स्वरूपमें नहीं। इसलिये सहजावस्थाको सबसे उत्तम कहा गया है-

उत्तम सहजावस्था मध्यमा ध्यानधारणा। कनिष्ठा शास्त्रचिन्ता च तीर्थयात्राऽधमाऽधमा॥