भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक १९ ]

  • साधक-संजीवनी *

२०३

अधिकार है।

(२) मा फलेषु कदाचन (कर्मफलोंमें तेरा कभी भी अधिकार नहीं है)।

(३) मा कर्मफलहेतुभूः (तू कर्मफलका हेतु मत बन)।

(४) मा ते सद्गुडस्वकर्मणि (तेरी कर्म न करनेमें आसक्ति न हो)।

प्रस्तुत (अठारहवें) श्लोकमें ठीक उपर्युक्त साधनाकी सिद्धिकी बात है। वहाँ (दूसरे अध्यायके सेंतालीसवें श्लोक) में दूसरे और तीसरे चरणमें साधकके लिये जो बात कही गयी है, वह प्रस्तुत श्लोकके उत्तरार्धमें सिद्ध महापुरुषके लिये कही गयी है कि उसका किसी प्राणी और पदार्थसे कोई स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता। वहाँ पहले और चौथे चरणमें साधकके लिये जो बात कही गयी है, वह प्रस्तुत श्लोकके पूर्वार्धमें सिद्ध महापुरुषके लिये कही गयी है कि उसका कर्म करने अथवा न करने—दोनोंसे ही कोई प्रयोजन नहीं रहता। इस प्रकार सत्रहवें-अठारहवें श्लोकोंमें ‘कर्मयोग’ से सिद्ध हुए महापुरुषके लक्षणोंका ही वर्णन किया गया है।

कर्मयोगके साधनकी दृष्टिसे वास्तवमें अठारहवाँ श्लोक पहले तथा सत्रहवाँ श्लोक बादमें आना चाहिये। कारण कि जब कर्मयोगसे सिद्ध हुए महापुरुषका कर्म करने अथवा न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं रहता तथा उसका किसी भी प्राणी-पदार्थसे किंचिन्मात्र भी स्वार्थका

परिशिष्ट भाव —संसारमें ‘करना’ और ‘न करना’—दोनों सापेक्ष हैं। इसलिये ‘मेरेको कुछ नहीं करना है’—यह भी ‘करना’ ही है। परन्तु परमात्मत्वमें ‘न करना’ निरपेक्ष है, स्वाभाविक है। कारण कि चिन्मय सत्ताका न तो क्रिया करनेके साथ सम्बन्ध है और न क्रिया न करनेके साथ सम्बन्ध है। इसलिये परमात्मत्वको प्राप्त हुए कर्मयोगी महापुरुषका न तो किसी वस्तु से कोई सम्बन्ध रहता है, न व्यक्तिसे कोई सम्बन्ध रहता है और न क्रियासे ही कोई सम्बन्ध रहता है—‘योऽवतिष्ठति नेङ्गते ’ (गीता १४।२३)। उसकी दृष्टिमें एक चिन्मय सत्ताके सिवाय कुछ नहीं रहता।

सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें वर्णित महापुरुषकी स्थितिको प्राप्त करनेके लिये साधकको क्या करना चाहिये—इसपर भगवान् आगेके श्लोकमें साधन बताते हैं।

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।

असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः ॥ १९ ॥

तस्मात्= इसलिये (तू)कर्म= कर्मकाकर्म= कर्म
सततम्= निरन्तरसमाचर= भलीभाँतिआचरन्= करता हुआ
असक्तः= आसक्तिरहित
(होकर)आचरण कर;पुरुषः= मनुष्य
कार्यम्= कर्तव्यहि= क्योंकिपरम्= परमात्माको
असक्तः= आसक्तिरहित (होकर)आप्नोति= प्राप्त हो जाता है।