श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २१ ]
- साधक-संजीवनी *
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‘लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि’—‘लोक’ शब्दके तीन अर्थ होते हैं—(१) मनुष्यलोक आदि लोक, (२) उन लोकोंमें रहनेवाले प्राणी और (३) शास्त्र (वेदोंके अतिरिक्त सब शास्त्र)। मनुष्यलोककी, उसमें रहनेवाले प्राणियोंकी और शास्त्रोंकी मर्यादाके अनुसार समस्त आचरणों (जीवनचर्यामात्र) का होना ‘लोकसंग्रह’ है। लोकसंग्रहका तात्पर्य है—लोकमर्यादा सुरक्षित रखनेके लिये, लोगोंको असत्से विमुख करके सत्के सम्मुख करनेके लिये निःस्वार्थभावपूर्वक कर्म करना। इसको गीतामें ‘यज्ञार्थ कर्म’ के नामसे भी कहा गया है। अपने आचरणों एवं वचनोंसे लोगोंको असत्से विमुख करके सत्के सम्मुख कर देना बहुत बड़ी सेवा है; क्योंकि सत्के सम्मुख होनेसे लोगोंका सुधार एवं उद्धार हो जाता है। लोगोंको दिखानेके लिये अपने कर्तव्यका पालन करना लोक-संग्रह नहीं है। कोई देखे या न देखे, लोक-मर्यादाके अनुसार अपने-अपने (वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिके अनुसार) कर्तव्यका पालन करनेसे लोकसंग्रह स्वतः होता है।
कोई भी कर्तव्य-कर्म छोटा या बड़ा नहीं होता। छोटे-से-छोटा और बड़े-से-बड़ा कर्म कर्तव्यमात्र समझकर (सेवाभावसे) करनेपर समान ही है। देश, काल, परिस्थिति,
परिशिष्ट भाव —यहाँ आये ‘कर्मणैव ही संसिद्धिमास्थिताः’ पदोंसे सिद्ध होता है कि कर्मयोग मुक्तिका स्वतन्त्र साधन है। जनकादि राजाओंने भी कर्मयोगके द्वारा ही परमसिद्धि प्राप्त की; क्योंकि उन्होंने केवल दूसरोंकी सेवाके लिये, उनको सुख पहुँचानेके लिये ही राज्य किया, अपने लिये राज्य नहीं किया।
‘लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि’ पदोंका तात्पर्य है कि तेरेको लोगोंमें कर्मयोगका यह आदर्श स्थापित करना चाहिये कि कर्मयोगका पालन करनेसे परमसिद्धिकी प्राप्ति हो जाती है।
सम्बन्ध-कर्म करनेसे लोकसंग्रह कैसे होता है—इसका विवेचन भगवान् आगेके श्लोकमें करते हैं।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥
| श्रेष्ठः | = श्रेष्ठ मनुष्य | तत्, तत् | = वैसा-वैसा | कुरुते | = कर देता है, |
|---|---|---|---|---|---|
| यत्, यत् | = जो-जो | एव | = ही (आचरण करते हैं)। | लोकः | = दूसरे मनुष्य |
| आचरति | = आचरण करता है, | सः | = वह | तत् | = उसीके |
| इतरः | = दूसरे | यत् | = जो कुछ | अनुवर्तते | = अनुसार आचरण |
| जनः | = मनुष्य | प्रमाणम् | = प्रमाण | करते हैं। |
- उदाहरणार्थ—कर्मके स्वरूपकी दृष्टिसे झाड़ू लगाना छोटा कर्म और व्याख्यान देना बड़ा कर्म प्रतीत होता है, एवं कर्म-फलकी दृष्टिसे कम दान करनेका कम पुण्य और अधिक दान करनेका अधिक पुण्य प्रतीत होता है।