श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 217, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें२१६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
परिशिष्ट भाव—महाभारतमें भगवान्ने उत्तंक ऋषिको भी तीनों लोकोंमें अपना कर्तव्य बताया है—
धर्मसंरक्षणार्थाय धर्मसंस्थापनाय च।
तैस्तैर्वैश्वच रूपैश्च त्रिषु लोकेषु भार्गव ॥ (महा० आश्व० ५४।१३-१४)
‘मैं धर्मकी रक्षा और स्थापनाके लिये तीनों लोकोंमें बहुत-सी योनियोंमें अवतार धारण करके उन-उन रूपों और वेषोंद्वारा तदुरूप बर्ताव करता हूँ।’
यदि ह्यहं न वर्तैयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ २३ ॥
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्या कर्म चेदहम्।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपह्न्यामिमाः प्रजाः ॥ २४ ॥
| हि | = क्योंकि | मनुष्याः | = मनुष्य | इमे | = ये |
|---|---|---|---|---|---|
| पार्थ | = हे पार्थ ! | सर्वशः | = सब प्रकारसे | लोकाः | = सब मनुष्य |
| यदि | = अगर | मम | = मेरे (ही) | उत्सीदेयुः | = नष्ट-भ्रष्ट हो जायें |
| अहम् | = मैं | वर्त्त | = मार्गका | च | = और (मैं) |
| जातु | = किसी समय | अनुवर्तन्ते | = अनुसरण करते हैं। | सङ्करस्य | = वर्णसंकरताको |
| अतन्द्रितः | = सावधान होकर | चेत् | = यदि | कर्ता | = करनेवाला |
| कर्मणि | = कर्तव्यकर्म | अहम् | = मैं | स्याम् | = होऊँ (तथा) |
| न | = न | कर्म | = कर्म | इमाः | = इस |
| वर्तैयम् | = करूँ (तो बड़ी हानि हो जाय ; क्योंकि) | न | = न | प्रजाः | = समस्त प्रजाको |
| कुर्याम् | = करूँ (तो) | उपह्न्याम् | = नष्ट करनेवाला बनूँ। |
व्याख्या—[बाईसवें श्लोकमें भगवान्ने अन्वय-रीतिसे कर्तव्य-पालनकी आवश्यकताका प्रतिपादन किया और इन श्लोकोंमें भगवान् व्यतिरेक-रीतिसे कर्तव्य-पालन न करनेसे होनेवाली हानिका प्रतिपादन करते हैं।]
‘यदि ह्यहं न वर्तैयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः’—पूर्वश्लोकमें आये ‘वर्त्त एव च कर्मणि’ पदोंकी पुष्टिके लिये यहाँ ‘हि’ पद आया है।
भगवान् कहते हैं कि मैं सावधानीपूर्वक कर्म न करूँ—ऐसा हो ही नहीं सकता; परन्तु ‘यदि ऐसा मान लें’ कि मैं कर्म न करूँ—इस अर्थमें भगवान्ने यहाँ ‘यदि जातु’ पदोंका प्रयोग किया है।
‘अतन्द्रितः’ पदका तात्पर्य यह है कि कर्तव्य-कर्म करनेमें आलस्य और प्रमाद नहीं करना चाहिये, अपितु उन्हें बहुत सावधानी और तत्परतासे करना चाहिये। सावधानी-पूर्वक कर्तव्य-कर्म न करनेसे मनुष्य आलस्य और प्रमादके शममें होकर अपना अमूल्य जीवन नष्ट कर देता है।
कर्मोंमें शिथिलता (आलस्य-प्रमाद) न लाकर उन्हें सावधानी एवं तत्परतापूर्वक करनेसे ही कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है। जैसे वृक्षकी कड़ी टहनी जल्दी टूट जाती है, पर जो अधूरी टूटनेके कारण लटक रही है, ऐसी शिथिल (ढीली) टहनी जल्दी नहीं टूटती, ऐसे ही सावधानी एवं तत्परतापूर्वक कर्म करनेसे कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, पर आलस्य-प्रमादपूर्वक (शिथिलतापूर्वक) कर्म करनेसे कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं होता। इसीलिये भगवान्ने उन्नीसवें श्लोकमें ‘समाचर’ पदका तथा इस श्लोकमें ‘अतन्द्रितः’ पदका प्रयोग किया है।
अगर किसी कर्मकी बार-बार याद आती है, तो यही समझना चाहिये कि कर्म करनेमें कोई त्रुटि (कामना, आसक्ति, अपूर्णता, आलस्य, प्रमाद, उपेक्षा आदि) हुई है, जिसके कारण उस कर्मसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं हुआ है। कर्मसे सम्बन्ध-विच्छेद न होनेके कारण ही किये गये कर्मकी याद आती है।