श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
| कर्मणि | = सम्पूर्ण कर्म | (परन्तु) | अहम् | = मैं |
|---|---|---|---|---|
| सर्वशः | = सब प्रकारसे | अहङ्कारविमूढात्मा | = अहंकारसे | कर्ता |
| प्रकृतेः | = प्रकृतिके | मोहित अन्तः— | इति | |
| गुणैः | = गुणोंद्वारा | करणवाला | मन्यते | |
| क्रियमाणानि | = किये जाते हैं; | अज्ञानी मनुष्य |
व्याख्या—‘प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्मणि सर्वशः’— ‘जिस समष्टि शक्तिके शरीर, वृक्ष आदि पैदा होते और बढ़ते-घटते हैं, गंगा आदि नदियाँ प्रवाहित होती हैं, मकान आदि पदार्थोंमें परिवर्तन होता है, उसी समष्टि शक्तिके मनुष्यकी देखना, सुनना, खाना-पीना आदि सब क्रियाएँ होती हैं। परन्तु मनुष्य अहंकारसे मोहित होकर, अज्ञानवश एक ही समष्टि शक्तिके होनेवाली क्रियाओंके दो विभाग कर लेता है—एक तो स्वतः होनेवाली क्रियाएँ; जैसे—शरीरका बनना, भोजनका पचना इत्यादि; और दूसरी, ज्ञानपूर्वक होनेवाली क्रियाएँ; जैसे—देखना, बोलना, भोजन करना इत्यादि। ज्ञानपूर्वक होनेवाली क्रियाओंको मनुष्य अज्ञानवश अपने द्वारा की जानेवाली मान लेता है।
प्रकृतिसे उत्पन्न गुणों—(सत्त्व, रज और तम—) का कार्य होनेसे बुद्धि, अहंकार, मन, पंचमहाभूत, दस इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंके शब्दादि पाँच विषय— ये भी प्रकृतिके गुण कहे जाते हैं। उपर्युक्त पदोंमें भगवान् स्पष्ट करते हैं कि सम्पूर्ण क्रियाएँ (चाहे समष्टिकी हों या व्यक्तिकी) प्रकृतिके गुणों द्वारा ही की जाती हैं, स्वरूपके द्वारा नहीं।
‘अहङ्कारविमूढात्मा’— ‘अहंकार’ अन्तःकरणकी एक वृत्ति है। ‘स्वयं’ (स्वरूप) उस वृत्तिका ज्ञाता है। परन्तु भूलसे ‘स्वयं’ को उस वृत्तिसे मिलाने अर्थात् उस वृत्तिको ही अपना स्वरूप मान लेनेसे यह मनुष्य विमूढात्मा कहा जाता है।
जैसे शरीर ‘इदम्’ (यह) है, ऐसे ही अहंकार भी ‘इदम्’ (यह) है। ‘इदम्’ (यह) कभी ‘अहम्’ (मैं) नहीं हो सकता—यह सिद्धान्त है। जब मनुष्य भूलसे ‘इदम्’ को ‘अहम्’ अर्थात् ‘यह’ को ‘मैं’ मान लेता है, तब वह
‘अहङ्कारविमूढात्मा’ कहलाता है। यह माना हुआ अहंकार उद्योग करनेसे नहीं मिटता; क्योंकि उद्योग करनेमें भी अहंकार रहता है। माना हुआ अहंकार मिटता है—अस्वीकृतिसे अर्थात् ‘न मानने’ से।
विशेष बात
‘अहम्’ दो प्रकारका होता है—
(१) वास्तविक (आधाररूप) ‘अहम्’*; जैसे—‘मैं हूँ’ (अपनी सत्तामात्र)।
(२) अवास्तविक (माना हुआ) ‘अहम्’; जैसे—‘मैं शरीर हूँ’।
‘वास्तविक अहम्’ स्वाभाविक एवं नित्य और ‘अवास्तविक अहम्’ अस्वाभाविक एवं अनित्य होता है। अतः ‘वास्तविक अहम्’ विस्मृत तो हो सकता है, पर मिट नहीं सकता; और ‘अवास्तविक अहम्’ प्रतीत तो हो सकता है, पर टिक नहीं सकता। मनुष्यसे भूल यह होती है कि वह ‘वास्तविक अहम्’—(अपने स्वरूप—) को विस्मृत करके ‘अवास्तविक अहम्’—(मैं शरीर हूँ—) को ही सत्य मान लेता है।
‘कर्ताहमिति मन्यते’— यद्यपि सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिजन्य गुणोंके द्वारा ही किये जाते हैं, तथापि अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य कुछ कर्मोंका कर्ता अपनेको मान लेता है। कारण कि वह अहंकारको ही अपना स्वरूप मान बैठता है। अहंकारके कारण ही मनुष्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदिमें ‘मैं’-पन कर लेता है और उन—(शरीरादि) की क्रियाओंका कर्ता अपनेको मान लेता है। यह विपरीत मान्यता मनुष्यने स्वयं की है, इसलिये इसको मिटा भी वही सकता है। इसको मिटानेका उपाय है—इसे विवेक-विचारपूर्वक न मानना;
- जिसको यहाँ ‘वास्तविक अहम्’ कहा है, वह वास्तवमें ‘अहम्’ नहीं है, प्रत्युत सत्-रूप, चित्-रूप तत्त्व है। उसको ‘वास्तविक अहम्’ इसलिये कहा है कि वह कभी बदलता नहीं, जबकि ‘अवास्तविक अहम्’ बदलता है। जैसे, कोई व्यक्ति पढ़ा-लिखा नहीं है, तो वह कहता है कि ‘मैं मूर्ख हूँ, अपढ़ हूँ’ और पढ़-लिखकर वही व्यक्ति कहता है कि ‘मैं विद्वान् हूँ, पढ़ा-लिखा हूँ’। इस प्रकार ‘अहम्’ के बदलनेपर भी अपनी सत्ता (‘मैं हूँ’) नहीं बदली। माने हुए ‘अहम्’ के साथ सदा रहनेसे ही उस सत्ताको ‘वास्तविक अहम्’ कहते हैं। माने हुए ‘अहम्’ का साथ मिटते ही अर्थात् वहाँसे दूषित हटते ही वह ‘वास्तविक अहम्’ सच्चिदानन्दस्वरूप हो जाता है।