श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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गुण-कर्म-विभागको तत्त्वसे जाननेका उपाय
१—शरीरमें रहते हुए भी चेतन-तत्त्व (स्वरूप) सर्वथा अक्रिय और निलिप्त रहता है (गीता—तेरहवें अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)। प्रकृतिका कार्य (शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि) 'इदम्' (यह) कहा जाता है। 'इदम्' (यह) कभी 'अहम्' (मैं) नहीं होता। जब 'यह' (शरीरादि) 'मैं' नहीं है, तब 'यह' में होनेवाली क्रिया 'मेरी' कैसे हुई? तात्पर्य है कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सब प्रकृतिके कार्य हैं और 'स्वयं' इनसे सर्वथा असम्बद्ध, निलिप्त है। अतः इनमें होनेवाली क्रियाओंका कर्ता 'स्वयं' कैसे हो सकता है? इस प्रकार अपनेको पदार्थ एवं क्रियाओंसे अलग अनुभव करनेवाला बन्धनमें नहीं पड़ता। सब अवस्थाओंमें 'नैव किञ्चित्कर्तोमीति' (गीता ५।८) 'मैं' कुछ भी नहीं करता हूँ'—ऐसा अनुभव करना ही अपनेको क्रियाओंसे अलग जानना अर्थात् अनुभव करना है।
२—देखना-सुनना, खाना-पीना आदि सब 'क्रियाएँ' हैं और देखने-सुनने आदिके विषय, खाने-पीनेकी सामग्री आदि सब 'पदार्थ' हैं। इन क्रियाओं और पदार्थोंको हम इन्द्रियों- (औँख, कान, मुँह आदिसे) जानते हैं। इन्द्रियोंको 'मन' से, मनको 'बुद्धि' से और बुद्धिको माने हुए 'अहम्'- (मैं-पन-) से जानते हैं। यह 'अहम्' भी एक सामान्य प्रकाश- (चेतन-) से प्रकाशित होता है। वह सामान्य प्रकाश ही सबका ज्ञाता, सबका प्रकाशक और सबका आधार है।
'अहम्' से परे अपने स्वरूप- (चेतन-) को कैसे जानें? गाढ़ निद्रामें यद्यपि बुद्धि अविद्यामें लीन हो जाती है, फिर भी मनुष्य जागनेपर कहता है कि 'मैं बहुत सुखसे सोया।' इस प्रकार जागनेके बाद 'मैं हूँ' का अनुभव सबको होता है। इससे सिद्ध होता है कि सुषुप्तिकालमें भी अपनी सत्ता थी। यदि ऐसा न होता तो 'मैं बहुत सुखसे सोया; मुझे कुछ भी पता नहीं था'—ऐसी स्मृति या ज्ञान नहीं होता। स्मृति अनुभवजन्य होती है। अतएव सबको प्रत्येक अवस्थामें अपनी सत्ताका अखण्ड अनुभव होता है। किसी भी अवस्थामें अपने अभावका ('मैं' नहीं हूँ—इसका) अनुभव नहीं होता। जिन्होंने माने हुए 'अहम्'- (मैं-पन-) से भी सम्बन्ध-विच्छेद करके अपने स्वरूप- ( 'है') का बोध कर लिया है, वे 'तत्त्ववित्'
कहलाते हैं।
अपरिवर्तनशील परमात्मतत्त्वके साथ हमारा स्वतःसिद्ध नित्य सम्बन्ध है। परिवर्तनशील प्रकृतिके साथ हमारा सम्बन्ध वस्तुतः है नहीं, केवल माना हुआ है। प्रकृतिसे माने हुए सम्बन्धको यदि विचारके द्वारा मिटाते हैं तो उसे 'ज्ञानयोग' कहते हैं; और यदि वही सम्बन्ध पहिलेताथ कर्म करते हुए मिटाते हैं तो उसे 'कर्मयोग' कहते हैं। प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ही 'योग' (परमात्मासे नित्य-सम्बन्धका अनुभव) होता है, अन्यथा केवल 'ज्ञान' और 'कर्म' ही होता है। अतः प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक परमात्मासे अपने नित्य-सम्बन्धको पहचाननेवाला ही 'तत्त्ववित्' है।
'गुणा गुणेषु वर्तन्ते'—प्रकृतिजन्य गुणोंसे उत्पन्न होनेके कारण शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि भी 'गुण' ही कहलाते हैं और इन्हींसे सम्पूर्ण कर्म होते हैं। अविवेकके कारण अज्ञानी पुरुष इन गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध मानकर इनसे होनेवाली क्रियाओंका कर्ता अपनेको मान लेता है। परन्तु 'स्वयं' (सामान्य प्रकाश—चेतन) में अपनी स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव होनेपर 'मैं कर्ता हूँ'—ऐसा भाव आ ही नहीं सकता।
रेलगाड़ीका इंजन चलता है अर्थात् उसमें क्रिया होती है; परन्तु खींचनेकी शक्ति इंजन और चालकके मिलनेसे आती है। वास्तवमें खींचनेकी शक्ति तो इंजनकी ही है, पर चालकके द्वारा संचालन करनेपर ही वह गन्तव्य स्थानपर पहुँच पाता है। कारण कि इंजनमें इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि नहीं हैं, इसलिये उसे इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिवाले चालक- (मनुष्य-) की जरूरत पड़ती है। परन्तु मनुष्यके पास शरीररूप इंजन भी है और संचालनके लिये इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि भी। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि—ये चारों एक सामान्य प्रकाश- (चेतन-) से सत्ता-स्फूर्ति पाकर ही कार्य करनेमें समर्थ होते हैं। सामान्य प्रकाश- (ज्ञान-) का प्रतिबिम्ब बुद्धिमें आता है, बुद्धिके ज्ञानको मन ग्रहण करता है, मनके ज्ञानको इन्द्रियाँ ग्रहण करती हैं, और फिर शरीररूप इंजनका संचालन होता है। बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ, शरीर— ये सब-के-सब गुण हैं और इन्हें प्रकाशित करनेवाला अर्थात् इन्हें सत्ता-स्फूर्ति देनेवाला 'स्वयं' इन गुणोंसे असम्बद्ध, निलिप्त रहता है। अतः वास्तवमें सम्पूर्ण गुण ही
१-अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः। ( योगदर्शन १।११ )
२-उदाहरणार्थ—वाणी 'पदार्थ' है, बोलनेकी प्रवृत्ति 'क्रिया' है और बोलना समष्टि शक्तिसे हो रहा है अर्थात् गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं; परन्तु मनुष्य अज्ञानवश पदार्थ और क्रियाको अपना मानकर स्वयं 'कर्ता' बन जाता है।