श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 254, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ३७]
- साधक-संजीवनी *
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सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देते हैं।
श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३७ ॥
श्रीभगवान् बोले—
| रजोगुणसमुद्भवः | = रजोगुणसे | है। | महापाप्मा | = महापापी है। |
|---|---|---|---|---|
| उत्पन्न | इह | = इस विषयमें | ||
| एषः | = यह | एषः | = यह (काम ही) | (तू) |
| कामः | = काम अर्थात् | क्रोधः | = क्रोध (में परिणत | |
| कामना (ही) | होता) है। | एनम् | = इसको (ही) | |
| पापका कारण | महाशनः | = (यह) बहुत | वैरिणम् | = वैरी |
| खानेवाला (और) | विद्धि | = जान। |
व्याख्या—‘रजोगुणसमुद्भवः’ —आगे चौदहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान् कहेंगे कि तृष्णा (कामना) और आसक्तिसे रजोगुण उत्पन्न होता है और यहाँ यह कहते हैं कि रजोगुणसे काम उत्पन्न होता है। इससे यह समझना चाहिये कि रागसे काम उत्पन्न होता है और कामसे राग बढ़ता है। तात्पर्य यह है कि सांसारिक पदार्थोंको सुखदायी माननेसे राग उत्पन्न होता है, जिससे अन्तःकरणमें उनका महत्त्व दृढ़ हो जाता है। फिर उन्हीं पदार्थोंका संग्रह करने और उनसे सुख लेनेकी कामना उत्पन्न होती है। पुनः कामनासे पदार्थोंमें राग बढ़ता है। यह क्रम जबतक चलता है, तबतक पाप-कर्मसे सर्वथा निवृत्ति नहीं होती।
‘काम एष क्रोध एषः’ —मेरी मनचाही हो—यही काम है। उत्पत्ति-विनाशशील जड़-पदार्थोंके संग्रहकी इच्छा, संयोगजन्य सुखकी इच्छा, सुखकी आसक्ति—ये सब कामके ही रूप हैं।
पाप-कर्म कहीं तो ‘काम’के वशीभूत होकर और कहीं ‘क्रोध’ के वशीभूत होकर किया गया दीखता है। दोनोंसे अलग-अलग पाप होते हैं। इसलिये दोनों पद दिये। वास्तवमें काम अर्थात् उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंकी कामना, प्रियता, आकर्षण ही समस्त पापोंका मूल है। कामनामें बाधा लगनेपर काम ही क्रोधमें परिणत हो जाता
है। इसलिये भगवान्ने एक कामनाको ही पापोंका मूल बतानेके लिये उपर्युक्त पदोंमें एकवचनका प्रयोग किया है।
कामनाकी पूर्ति होनेपर ‘लोभ’ उत्पन्न होता है और कामनामें बाधा पहुँचनेपर (बाधा पहुँचानेवालेपर) ‘क्रोध’ उत्पन्न होता है। यदि बाधा पहुँचानेवाला अपनेसे अधिक बलवान् हो तो क्रोध उत्पन्न न होकर ‘भय’ उत्पन्न होता है। इसलिये गीतामें कहीं-कहीं कामना और क्रोधके साथ-साथ भयकी भी बात आयी है; जैसे—‘वीतरागभयक्रोधाः’ (४।१०) और ‘विगतेच्छाभयक्रोधः’ (५।२८)।
कामना-सम्बन्धी विशेष बात
कामना सम्पूर्ण पापों, सन्तापों, दुःखों आदिकी जड़ है। कामनावाले व्यक्तिको जाग्रतमें सुख मिलना तो दूर रहा, स्वप्नमें भी कभी सुख नहीं मिलता—‘काम अछत सुख सपनेहूँ नाहीं’ (मानस ७।१०।१)। जो चाहते हैं, वह न हो और जो नहीं चाहते, वह हो जाय—इसीको दुःख कहते हैं। यदि ‘चाहते’ और ‘नहीं चाहते’ को छोड़ दें, तो फिर दुःख है ही कहाँ!
नाशवान् पदार्थोंकी इच्छा ही कामना कहलाती है। अविनाशी परमात्माकी इच्छा कामनाके समान प्रतीत होती हुई भी वास्तवमें ‘कामना’ नहीं है; क्योंकि उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंकी कामना कभी पूरी नहीं होती, प्रत्युत
१-‘इदं मे स्यादिदं मे स्यादितिच्छा कामशब्दिता’ (‘यह मुझे मिल जाय, यह मुझे मिल जाय’—इस प्रकारकी इच्छा ‘काम’ कहलाती है)।
२-यद्यपि भगवत्सदत्त विवेकको महत्त्व न देना और भगवान्से विमुख होना भी पापमें हेतु है, तथापि यहाँ ‘काम’ को ही पापका हेतु इसलिये बताया गया है कि यह (तीसरा) अध्याय ‘कर्मयोग’ का है और कर्मयोगका प्रधान लक्ष्य कामनाको मिटाना ही है।
३-‘जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई’ (मानस १।१८०।१; ६।१०२।१)।